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Tuesday, June 9, 2015

अरविन्द केजरीवाल और तोमर: कर्म का दिवालियापन



अरविन्द केजरीवाल और तोमर: कर्म का दिवालियापन

जितेन्द्रसिंह तोमर की सायंस स्नातक और वकालत की डिग्री की सत्यता या उसके जाली होने को लेकर देश के समाचार माध्यमों में बहस का जो स्तर दिखा उससे डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत उल्टा चलता दिखाई देता है. हम वनमानुष से इंसान बनने के बजाये इंसान से वनमानुष होने की यात्रा पर बढ़ते ज्यादा दिखाई दे रहे है. विज्ञान और प्रोदोयोगिकी के इस जमाने में किसी व्यक्ति की शैक्षणिक पात्रता का पता लगाने में कितना वक्त लगना चाहिए? ईमेल और संचार क्रांति के इस जमाने में महज बीस वर्ष पुरानी किसी डिग्री की सत्यता का पता ज्यादा से ज्यादा चौबीस या बहुत हुआ तो ७२ घंटों का मामला है. यदि अरविन्द केजरीवाल और जितेन्द्रसिंह तोमर अपनी बात पर दृढ़ रहना चाहते थे तो उन्हें केवल इतना करना था कि तोमर की असली डिग्रीयां अपनी पार्टी की वेबसाइट पर डाल देते और फिर लोगों को चुनौती देते कि आओ, हिम्मत है तो उन्हें झूठा साबित करके दिखाओ. 
किंतु दुर्भाग्य से दोनों ने अपनी पार्टी के पारदर्शकता के आसमानी दावों के बावजूद आज तक ऐसा नहीं किया. वे चाहते तो पिछले चार महीनों में आसानी से देश को बता सकते थे कि तोमर  कब, किस विश्वविद्यालय में पढ़े है, कब पास या फेल हुए, कब उन्होंने अपना विश्वविद्यालय बदला और कब वे वकील के रूप में अपनी वकालत शुरू करने के पात्र हुए थे. लेकिन दोनों ही महाशय अपनी ओर से सच्चाई छिपाते रहें और हमारे अन्य भ्रष्ट नेताओं की तरह यही बहाना बनाते रहें कि मामला उच्च न्यायालय में प्रलंबित है और उसका फैसला आने वाला है. उधर जिस व्यक्ति ने यह मामला उच्च न्यायालय में दाखिल किया था, उसके साथ मिलकर वे इस मामले को कमजोर भी करते रहें. 

अब पूरी आम आदमी पार्टी चिल्ला रही है:

  •         कि तोमर कोई आतंकवादी तो नहीं है कि उन्हें इतनी रफ्तार से पकड़ना जरुरी था,
  •         कि देश में लोकतंत्र खतरे में है, आपातकाल आ रहा हैं, और  
  •         कि कई अन्य नेताओं (उदा. स्मृति ईरानी, बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण महाराज) आदि की भी डिग्रियां फर्जी है.

मेरी अपनी वकालत की समझ से इन प्रश्नों के उत्तर निम्न है:-

इसमें कोई शक नहीं है की तोमर आतंकवादी नहीं है किंतु क्या किसी वकील और नेता को जालसाजी के बल पर लोगों को मूर्ख बनाने की केवल इस आधार पर छूट दी जा सकती है कि वह कहीं भाग कर तो नहीं जा रहा है? किसी नेता पर कोई कार्यवाही जल्दबाजी में हुयी या देरी से, इसका पैमाना क्या होना चाहिए? यहाँ तो मामला चार महीनों से जनचर्चा का विषय है, एक माह पूर्व इसमें पोलिस शिकायत दर्ज हो चुकी है, संबंधित विश्वविद्यालय तोमर की दोनों डिग्रियां जाली होने की घोषणा कर चुके है. ये दोनों विश्वविद्यालय  गैरभाजपा शासित राज्यों में है. एक में तो केजरीवाल के मित्र नितीश कुमार की सत्ता है. फिर इस मामले में वे और कितनी देरी चाहते है? रहा सवाल उच्च न्यायालय में मामले के प्रलंबित होने का, तो इससे भी कहीं पुलिस के अपराधिक मामले में जाँच के अधिकार कम नहीं होते. यदि तोमर चाहते तो अभी तक उच्च न्यायालय में अपनी असली डिग्रियाँ बता कर मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कर सकते थे. किंतु वे तो वहाँ भी मामले को रफादफा करवाना चाहते थे. इसलिए आज इन दोनों नेताओं का यह प्रलाप केवल दूसरों को मूर्ख समझने का पागलपन है.

रहा सवाल आपातकाल का, तो इस पर मेरा प्रश्न यह है कि क्या किसी जालसाज के अपने पद पर बने रहने देने से देश में लोकतंत्र चिरस्थाई हो जाता? अरविंद केजरीवाल का यह तर्क तो ऐसा है मानो जो व्यवस्था उनसे कुछ भी जायज प्रश्न पूछेगी, वह तानाशाही वाली व्यवस्था होगी. वास्तव में न्यायालय, पुलिस, विधानसभा, पार्टी, विरोधी दल और पार्टी के असंतुष्ट तो होते ही इसलिए है कि हम इन सभी के दबाव में अपनी सीमाओं में चलना सीखें. जहाँ ये नहीं होते है, वहाँ तानाशाही निश्चित रूप से आती है, जोकि उन्होंने अपनी ही पार्टी में लागु करके रखी है.

आज उनकी बेशर्म मूर्खता पर वहाँ ऊँगली उठाने लायक भी कोई बचा नहीं है. आशुतोष और संजय सिंह जैसे किसी ज़माने के तर्कशील वक्ता अपने आप में बेहद हास्यास्पद लगने लगे है और बात बात में चिड़कर अपनी बात रखते है. उनका तर्क बच्चों के समान बेहद सरल होता है, “क्लास में मस्ती मैंने अकेले ने नहीं की, बाकी ने भी की है, उन्हें भी साथ साथ सजा दो.” यह तो ऐसे हुआ मानो रात में आपके घर में कोई चोर पकड़ा जाता है, आप पकड़कर उसे पुलिस के हवाले करते है, और वह पुलिस से मुंहजोरी करने लगे कि पहले गांव के बाकी चोर पकड़ो, फिर मुझे हाथ लगाना. पुलिस नहीं मानती है तो देश में आपातकाल आ गया है और मान जाती है तो देश में लोकतंत्र कायम है. दुर्भाग्य से यह घटिया तर्क उस पार्टी की ओर से आ रहा है जिस पर इस देश ने अपनी सबसे ज्यादा आशायें लगा रखी थी.  

अब रहा सवाल देश के बाकी के नेताओं की डिग्रियों का. इस बात की बारीकी को समझने के लिए पहले तो हमें यह पता होना चाहिए कि देश में किसी भी राजनैतिक पद पर पहुंचने की कोई भी शैक्षणिक अर्हता हमारे संविधान ने तय नहीं की है. कोई अनपढ़ आदमी भी देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकता है. आपको वकालत करने के लिए कानून की डिग्री अनिवार्य है, कानून मंत्री बनने के लिए नहीं. आपको लोगों की चिकित्सा करने के लिए डॉक्टर की डिग्री आवश्यक है, स्वास्थ्य मंत्री बनने के लिए नहीं. आपको एक दुचाकी वाहन भी चलाना हो तो परिवहन विभाग का असली लायसेंस आवश्यक है, किंतु देश का परिवहन मंत्री बनने के लिए इसकी कतई जरूरत नहीं है. वहाँ पहुँचने के लिए एकमात्र योग्यता है कि आप लोगों के प्रतिनिधि के रूप में चुनाव में चुन कर आये. यह लोगों का अधिकार है कि वे आपको जाने, समझे और स्वीकार करें या ठुकरा दें. इसलिए किसी अन्य नेता की शैक्षणिक पात्रता की तुलना एक वकील से कैसे हो सकती है, जो अपनी जाली डिग्री के बल पर आज तक अपने पक्षकारों और देश की अदालतों की आँखों में धूल झोंक रहा था? बस इसी कारण से तोमर कानून के सामने अपराधी है और बाकी के लोग महज शेखी बघारने के दोषी.  

दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार चला रही है कि सर्कस, यही समझ से परे है. संचित कर्मो का दिवालियापन कभी कभी तकदीर से मिले किसी महान अवसर को किस तरह बर्बाद करता है, अरविंद केजरीवाल, आने वाले दौर में उसकी एक मिसाल के रूप में अवश्य याद किये जायेंगे.  

दिनेश शर्मा

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