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Tuesday, September 1, 2015

महिला प्रश्न और शरद जोशी



महिला प्रश्न और शरद जोशी

शेतकरी संघठन के प्रणेता शरद जोशी दिनांक ३ सितंबर को अपनी जिंदगी के आठ दशक पूरे कर रहे हैं. आपातकाल के संक्रमणकाल के बाद जब देश में क्रांति और बदलाव के नाम पर कई अजूबे जन्म ले रहे थे, महाराष्ट्र की प्रतिभा संपन्न भूमी ने अपने स्तर पर किसानों के जीवन की चिरस्थायी त्रासदी का हल खोजने की कोशिश की थी. डेढ़ शताब्दी पहले यही प्रयास ज्योतिबा फुले भी कर चुके थे. उलट पुलट का यह वह दौर था, जब वामपंथ की असफलता क्षितिज पर दिखाई देने लगी थी, समाजवादी राजनीती अपने-अपने जन्म स्थानों पर मजबूत जातियों का आश्रय खोज रही थी और हिन्दूवादी राजनीती का जन्म होना बाकी था. उस नितांत प्रेरणाहीन दौर में शरद जोशी उठे और उनके साथ उठा था सीधेसाधे मराठी मानूस के भीतर का वैश्विक कालपुरुष.

शरद जोशी ने नारेबाजी नहीं की, वे दूसरों के विचारों की फंतासी में नहीं भटके. उन्होंने पूना के अम्बेठान में स्वयं खेती की, खेती में मजदूरी करने वाले मजदूरों और उनकी महिलाओं के साथ खेती के प्रत्यक्ष अनुभव साझा किये और अपने उन्ही अनुभवों की शिदोरी साथ में लेकर जब वे अपनी उपज को बाजार में बेचने आये, एक क्रूर सत्य से उनका साक्षात्कार हुआ. सत्य यही था कि नेहरूवादी विकास माडेल में किसानों का शोषण कोई हादसा नहीं, एक सोची समझी सरकारी योजना का हिस्सा है. इस अनुभव से यह सत्य भी उद्घाटित हुआ कि सरकारें महज एक अनिवार्य बुराई मात्र है, वे समाज को ना तो बदल सकती है ना ही सुधार सकती है. अत: वे जितना कम या सीमित हो उतना मानवीय प्रतिभा अपने अंतहीन सपनों की यात्रा पर निकल सकती है.  जहाँ जहाँ सरकारे मजबूत होगी, वहाँ वहाँ का समाज उतना दरिद्र होगा. शरद जोशी ने यह सत्य उस समय उद्घाटित किया था जब सोव्हियत रूस का पतन होना बाकी था और चीन के भीतर की भयानक खबरें अभी बाहर आयी नहीं थी.

इन्हीं प्रत्यक्ष अनुभवों ने शरद जोशी के स्त्री संबंधी विचारों को भी घड़ा था. जब बीजिंग में वैश्विक महिला सम्मेलन हो रहा था और पूर्व से पश्चिम तक समूचे विश्व में नारी मुक्ति के उग्र नारों का शोर सुनाई दे रहा था, शरद जोशी ने महाराष्ट्र में बीजिंग विरोधी महिला परिषद का आयोजन किया. उन्होंने पहली बार किसानों और उद्यमियों की महिलायें क्या सोचती है, इस सत्य को दुनिया के सामने रखा. शरद जोशी के चिंतन की महिलायें पुरुषों से मुक्त नहीं होना चाहती थी, वे उत्पादन की प्रक्रिया में अपनी मेहनत का सम्मान चाहती थी. उसका सपना आजादी का नहीं, बल्कि पुरुष के जीवन में गरिमापूर्ण उपस्थिति का था. उनके चिंतन की महिला के लिए उसकी प्रेरणा के बिना उसका पुरुष और अपने पुरुष के उद्यम के बिना वह स्वयं अधूरी थी. वे दोनों एक दूसरे को पूर्ण करनेवाली ताकतें थी, और इसलिए उन्हें एक दूसरे के साथ में रहने का तरीका समझना ही पड़ेगा और साथ साथ एक दूसरे की उन्नति का साधन बनना होगा.  

शरद जोशी के चिंतन की नारी अपनी कथित आजादी के नाम पर मनुष्यता ने अपनी सृजनात्मकता से जो कुछ भी आज तक अर्जित किया है उसे दांव पर लगाना नहीं चाहती बल्कि अपने परिवार में ही रहकर एक नैतिक जीवन जीते हुए भावी पीढ़ी का निर्माण करना चाहती है. उसके लिए पति और ससुरालवालें असली दुश्मन नहीं थे बल्कि शराब के अड्डे चलानेवाले, लॉटरी और मटके की दुकान चलानेवाले और महिलाओं का अश्लील निरूपण करके मनुष्य की प्रतिभा को तबाह करने वाले लोग  असली दुश्मन थे. इसलिए शरद जोशी के चिंतन की महिला अपने पतियों के खिलाफ उग्र नारे लगाती बाहर नहीं निकली बल्कि उसने शराब के अड्डों पर धरने दिए और सरकार को उन्हें बंद करने के लिए मजबूर किया. उनके चिंतन की महिला पुराणों की सावित्री की तरह अपने पति को यमराज के भी चंगुल से निकालने का इरादा रखती थी, उसे त्यागकर अपने लिए कोई नया स्वर्ग निर्मित नहीं करना चाहती थी.

वह जानती है कि “भारत के उपर इंडिया के हमले” में उसका पति भी घायल है, टूटा हुआ, परास्त और हतबल है. वह देख रही थी कि शहर की भाषा, शहर के कानून और शहर के सरकारी कारकून किस तरह उसके पति के श्रम की कौड़ी मोल बोलियाँ लगाते है और किसतरह उसे बेवकूफ साबित करने पर तुले है. इसीलिए गाँव की वह महिला इंडिया के बनाये कानूनों से उतनी ही दुखी और शोषित है, जितनी कि उसके परिवार के अन्य लोग. उसके लिए सरकार, पुलिस और अदालतें शोषण से मुक्ति देनेवाले तारणहार ना होकर पति के साथ उसके भी साझा दुश्मन है क्योंकि ये तबके उन दोनों की मेहनत से उपजे उत्पादन पर डाका डालने वाले सरकारी मान्यताप्राप्त दस्यु गिरोह मात्र हैं.  समस्त कानूनों के प्रति शरद जोशी की सोच का अंतर्भूत तिरस्कार उन्हें हिंद स्वराज्य से झलकते गाँधी के करीब-करीब लेकर जाता है. कभी डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने काँग्रेस से यही प्रश्न किया था, “कैसी सरकार और कौनसी आजादी? यदि आपकी कथित आजादी के बाद उच्च वर्ग शोषक और दलित वर्ग शोषित ही रहनेवाला हो, तो हम क्यों तुम्हारे स्वतंत्रता समर में शामिल हो? हम तो तुम्हारी आजादी के बाद लुटने ही वाले है, तुमसे बेहतर तो ये अंग्रेज है, जो कम से कम हमें सुरक्षा तो दे रहे है.”   

ठीक यही प्रश्न शरद जोशी ने नेहरू और इंदिरा गाँधी प्रणित काँग्रेस से किया और अपने लाजबाव आँकड़ों से यह साबित कर दिया कि नेहरु की शहर समर्थक और उद्योगों को पोषित करनेवाली राजनीति में ही उजड़ते और जर्जर होते ग्रामीण भारत का अपराधी छिपा था. फिर उनके चिंतन की स्त्री उन अपराधियों के साथ किस तरह खड़ी रहती?

आश्चर्य की बात यह है कि जो स्त्री शरद जोशी को दिखाई दी वह किसी स्वदेशी विचारक, समाजवादी या वामपंथी को क्यों नहीं दिखाई दी? बीजिंग महिला परिषद के द्वारा तय दायरे में हमारी सरकारें कानून बना बना कर पुरुष विरोधी अदालतों को मजबूत करती रही और उनके बोझ से हमारी सदियों पुरानी पारिवारिक संस्था ध्वस्त होती चली गयी. आज बड़े बुजुर्गों, साझा रिश्तेदारों-मित्रों को मानो हमारे घरों से बाहर निकाला जा चुका है और वकील, पुलिस और अदालतें न्याय के नाम पर इन परिवारों के उत्पादन में अपना हिस्सा मांग रहे हैं. जो पैसा बच्चों के शिक्षण और चारित्रिक विकास पर खर्च हो सकता था, वह पैसा नये नये कानूनों के द्वारा समाज को और ज्यादा गुलाम बनाने पर खर्च हो रहा है.     

एक निरपेक्ष दृष्टा के नाते मेरा सदा यह मानना रहा है कि जब तक पुरुष के माध्यम से महिलायें और महिलाओं के गर्भ से पुरुष जन्म लेते रहेगा, वे एक दूजे के दुश्मन कैसे हो सकते है? किंतु दुर्भाग्य की बात यही है कि आज हमने एक ही ईश्वर के बनाये एक दूसरे के लिए पूरक दो सृजनात्मक अविष्कारों को प्रतिद्वंदी के रूप में एक दूसरे के सामने खड़ा कर दिया है. इस अर्थ में मनुष्यता मानो पहली बार अपने अस्तित्व का सबसे बड़ा सकंट झेल रही है. काश: अपनी तरुणाई का बड़ा हिस्सा पाश्चात्य विश्व में जीने वाले शरद जोशी को जो सृजनात्मक महिला भारत में दिखाई दी, वही हमारे तमाम समाजवादी, स्त्रीवादी और वामपंथी कार्यकर्ताओं को दिखाई दे जाती तो शायद आज हम ज्यादा गरिमामय और स्वाधीन जिंदगी के पथ पर अग्रगामी होते. न्याय की भीख माँगते पुलिसथानो और अदालतों के भ्रष्ट गलियारों में नहीं भटकते.

अपने ऐसे ही लाजवाब विचारों से मेरी पीढ़ी को समृद्ध करनेवाले इस ज्ञान योगी के सामने अपने अंतर्मन की गहराइयों से झुकने को जी चाहता है. ज्ञान-योगी कर्म की यह यात्रा शतायु हो, यही उस महान ईश्वर से प्रार्थना है..

दिनेश शर्मा
  

Saturday, June 13, 2015

क्या प्रतिभा केवल वामपंथीयों की बपौती है?



क्या प्रतिभा केवल वामपंथीयों की बपौती है?

पूना के राष्ट्रीय फिल्म और टीवी संस्थान पर टीवी के प्रसिद्ध कलाकार गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति पर संस्थान के वामपंथी झुकाव वाले विद्यार्थी इस तर्क से आपत्ति जता रहे हैं कि गजेंद्र चौहान की नियुक्ति मोदी सरकार का इस राष्ट्रीय संस्थान के कामकाज में हस्तक्षेप है और उनकी अकादमीक पात्रता महेश भट्ट, श्याम बेनेगल, अडूर गोपालकृष्णन और गिरीश कर्नाड जैसों की तुलना में कहीं नहीं ठहरती. वास्तव में महेश भट्ट की प्रत्येक फिल्म अपराधियों के उदात्तीकरण और कामुक कुंठा की अभिव्यक्ति के सिवा कौन सा संदेश देती है? क्या उनकी फिल्म इस देश के लाखों आम लोगों के जीवन संघर्ष का कहीं दीदार कराती है? क्या इस देश के दस हजार साल के गौरवशाली पन्नों का कहीं उनमें जिक्र होता है? किंतु इन वामपंथी विद्यार्थियों की नजर में वे प्रतिभाशाली है, गजेंद्र चौहान नहीं.

गजेंद्र चौहान का अपराध सिर्फ इतना है कि वे ९० के दशक के प्रसिद्द पौराणिक सीरियल “महाभारत” में युधिष्टर की भूमिका में काम कर चुके है और भाजपा के कुछ करीब है. किंतु क्या महेश भट्ट भी देश में गाँधी परिवार के करीबी नहीं थे? देश के अनेकानेक महत्व के संस्थानों पर वामपंथी झुकाव वाले लोगों को बिना किसी उपलब्धि या पात्रता के बनाये रखना और राष्ट्रवादी झुकाव वाले लोगों को कम अक्ल वाला बता कर उनकी नियुक्ति का विरोध करना, हमारी किस सोच का दर्शन कराता है?

जो वामपंथ का विचार उसके अपने जन्मस्थान रशिया और चीन से बेदखल किया जा चुका है, जिस वामपंथ पर दुनिया में स्वतंत्र विचार करने की आजादी को ही तबाह कर देने के आरोप लग चुके है, जिसके हाथ और पाँव अपने ही देशों के करोड़ों नागरिकों के खून से सने हुए है, जो आज भी नक्सलवाद के रूप में हमारी सरकारों को नासूर की तरह चुभते रहता है, आपको भारत में आज भी उस विचार की जयजयकार करनेवाले मूढ़ हर कहीं मील जाएंगें. खुद लाखों के वेतन वाली नौकरी पर कब्जा जमाए रखकर कोई सृजन नहीं करना और दूसरों की सृजनात्मकता को औसत और कमतर बता कर उस पर बहस तक से मुकरना, हमारे देश के वामपंथी विचारकों का दोधारी हथियार रहा है.

दुनिया का इतिहास गवाह है कि जहाँ जहाँ वामपंथ गया, वहाँ मानवीय स्वतंत्रता, मौलिकता और सृजनात्मकता ने अपनी अंतिम साँसें गिनी है. जीवन बुनियादी जरूरतों के आसपास ही केंद्रित रहा है, स्त्री पुरुष सबंध पशुओं से भी बदतर हाल में तब्दील कर दिए गए और समाजों की हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरायें पूरी तरह नष्ट भ्रष्ट कर दी गयी है. धर्म के मंदिर तोड़ कर उन्होंने अपने ही नेताओं के उनसे भी विशाल मंदिर बनवाए और उनकी पूजा अनिवार्य कर दी गयी. क्या किसी भी वामपंथी फिल्मकार ने इस तबाही पर कोई फिल्म कभी दुनिया को दिखाई है?

अपना एजेंडा लागु करने का वामपंथियों का एक आजमाया हुआ नुस्खा है. अपनी फिल्मों और आंदोलनों के माध्यम से परिवारों और समाजों को कमजोर करना और सरकारी संस्थाओँ को मजबूत करना. बाद में भले ही वे संस्थांए अपने भ्रष्ट आचरण से नागरिकों का जीना हराम कर दें, किंतु इससे वामपंथ मजबूत होता है, क्योंकि उसके सदस्य बढ़ते हैं. परिवार और समाज जितना संघठित होगा, वामपंथ उतना कमजोर होगा और समाज जितना कमजोर और सरकार जितनी मजबूत होती है, वामपंथ उतना शक्तिशाली और त्रासदायक हो जाता है. देश के किसी भी वामपन्थी संघठन ने आज तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया है क्योंकि सरकार के कर्मचारी तो इनकी मुख्य ताकत है.

आज देश के लगभग समस्त विश्वविद्यालयों में आपको सर्वोच्च पदों पर वामपंथी हावी मिलेंगें. क्या कोई उनसे पूछ सकता है कि क्यों आज हमारा कोई भी शैक्षणिक संस्थान विश्व के पहले पांच सौ संस्थानों में भी शामिल नहीं किया जाता? दशकों पुराने पाठ्यक्रम आज भी देश के युवाओं को पढ़ाकर उनकी जिंदगी से हर रोज खिलवाड़ किया जा रहा हैं, हर वर्ष देश के विश्वविद्यालय आस्ट्रेलिया की आबादी जितने बेरोजगारों की सौगात भारत को देते चले आ रहे हैं. किंतु उनके चलानेवालों को इससे कोई फर्क नहीं पढ़ता, उनके वेतन भत्ते चलते रहते हैं, बढ़ते रहते हैं.  

दुर्भाग्य से इस वामपंथी अधिनायकवाद के चलते हमारे देश में वास्तविक अर्थो में दक्षिणपंथी या राष्ट्रवादी विचार का जन्म ही नहीं हुआ है. हमारी प्रेरणाएँ आज भी विदेशों की ओर ताकती है. हमारा मिडिया हो या समस्त शैक्षणिक संस्थान, वहाँ की बहस में राष्ट्रवाद कट्टर लोगों की मानसिकता माना जाता है, धार्मिकता पिछड़े लोगों की जीवन शैली माना जाता है और कथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हर किस्म की औसत राजनीति को बर्दाश्त करना, उनकी दुनिया में आधुनिकता माना जाता है.

उनकी कथित धर्मनिरपेक्षता अल्पसंख्यकों से तो आग्रह करती है कि वे अपने धर्म और परंपराओं पर टिके  रहें और धर्म के नाम पर एकत्रित होकर मतदान करें किंतु बहुसंख्यक समाज से उनकी अपेक्षा है कि वह अपने धर्म और पहचान का कहीं दावा ना करें और उन्हें समाप्त हो जाने दें. हमारा मिडिया राष्ट्रवादी या दक्षिणपन्थी विचारों के प्रतिनिधि के रूप में किसी बेवकूफ बाबा, महाराज  या साध्वी को सामने ले आता है. उनके मूर्खतापूर्ण बड़बोले बयानों को समाचारों में तब्दील किया जाता है और हफ्तों उस पर बहस का पाखंड रचा जाता है. किंतु किसी भी वामपंथी असर वाले संस्थान के कामकाज या उनके खर्चो पर आपको कोई बहस या समाचार सुनने को नहीं मिलता.  देश को असली खतरा इन बाबाओं या साध्वियों से ना होकर देश का करोड़ों रुपया हर साल निगलने वाले इनके कामचोर संस्थानों से हैं.

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सृजनात्मकता से हीन दीन औसत विचारों वाले झोलाछाप बड़बोले कार्यकर्ता आपको देश को बहकाते मिल जाएंगें, सख्त से सख्त कानून बना कर देश की जनता को पुलिस, वकील और अदालतों के हवाले कर देने की जिरह करते मिल जायेंगे. किंतु देश के किसी भी प्रसार माध्यम में कोई भी वक्ता इन संस्थानों के वामपंथी नेतृत्व पर ऊँगली नहीं उठाता, उनकी रईस जीवन शैली और सादगी पर भाषणों के विरोधाभास पर कोई शक नहीं करता क्योंकि देश में वे बुद्धिमान और प्रतिभाशाली माने जाते है, या मिडिया के माध्यम से ऐसा वातावरण बन दिया जाता है कि लोग इन्हें प्रतिभाशाली माने.   

आज नेहरु की गलतियों की सजा देश भुगत रहा है. गांधीवाद की सादगी और कम खर्च वाली जीवन शैली को हमारे सामाजिक जीवन और सरोकारों से धकियाया जा चुका है, हमारी धार्मिक जीवन शैली को पिछड़ापन माना जा चुका है और देश के भविष्य को निर्माण करनेवाले संस्थान दूसरों की मेहनत को चूसने वाले कथित विचारको के हवाले सौंपे जा चुके है. देश और उसके राष्ट्रीय संस्थानों को यदि कहीं कोई भी खतरा है तो वह इन वामपंथी विचारकों से हैं ना कि देश की प्राचीनतम जीवन शैली को मानने वालों से.  

काश! ये नासमझ विद्यार्थी जितनी जल्दी इस सत्य को समझ लेंगें उतना इस देश को उनकी प्रतिभा से फायदा होगा.

दिनेश शर्मा

गाँधी नाम की दुकान

इस देश में गाँधी नाम के प्रमाणपत्र बाँटने का ठेका केवल गिने चुने खानदानों या उनके लाभार्थियों ने लेकर रखा है. इन लोगों को लेफ्ट से कोई समस्य...