शरद जोशी- एक कंठ विषपायी
मुझे उनसे मुलाकात की तारीख आज भी याद है, २३ दिसंबर, १९९४. अपनी नयी-नयी राजनैतिक पार्टी ‘स्वतंत्र भारत पक्ष’
के लिए जन समर्थन जुटाने के लिए शरद जोशी पुलगांव आने वाले थे. पुलगांव के श्री विजय राठी और नंदकिशोर काले जैसे उनके कुछ
कार्यकर्ता मेरे पास प्रस्ताव लेकर आये थे कि शरद जोशी की पुलगांव की प्रस्तावित
सभा की अध्यक्षता मैं करूं. मैं उस दौर में अपने मुक्त अर्थव्यवस्था समर्थक
विचारों के लिए जाना जाने लगा था. १९८९ में भाजपा से जुड़कर, किन्तु बाद में उनकी
कट्टर स्वदेशी वाली नारे बाजी से निराश होकर मैं भाजपा से भी अलिप्त हो चुका था. शरद जोशी की नयी पार्टी का घोषणापत्र मानो मानवीय
गरिमा और स्वतंत्रता की मेरी ही संकल्पनाओं की अभिव्यक्ति था. रवीन्द्रनाथ टैगोर
की विश्व प्रसिद्ध कविता ‘जहाँ चित्त भयशून्य, उन्नत जहाँ भाल हो’ इस
घोषणापत्र के मुखपृष्ठ पर छपी थी. मैंने उनकी सभा की अध्यक्षता करना स्वीकार कर लिया.
पुलगांव के अग्रवाल बाड़े में २३ दिसंबर १९९४ को यह सभा हुयी. वे मुख्य वक्ता होने
से मेरा अध्यक्ष का भाषण उनसे पहले ही निपटा दिया गया. मैंने अपनी विनोदी शैली में
पहले ही सभा को उठा दिया था. शरद जोशी ने उसे और भी नयी ऊचाईयों पर पहुंचा दिया. जनसमूह
मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुन रहा था. उनका भाषण मेरे भीतर की ओजस्विता को नए आयाम
दे रहा था. वे अपने भाषण में बार बार मेरा संदर्भ दे रहे थे. मेरे जैसे नवयुवक के
लिए यह एक बेहद शाबासी वाला मामला था. भाषण देकर मैं अपने घर और वे एक कार्यकर्ता श्री
दिनेश धांदे के घर पर चाय पानी के लिए निकल गए. कुछ ही देर में एक कार्यकर्ता मेरे घर पर आकर
कहने लगा कि आपको साहब ने बुलाया है. मैं त्वरित उनसे मिलने पहुंच गया. मुझे
कार्यकर्ता उनके पास लेकर गए. वे सीधे विषय पर आ गए. उन्होंने कहा ‘दिनेशजी, आपकी ओजस्वी हिंदी और हमारे
तर्कपूर्ण विचारों का यदि जोड़ बैठ जाए तो दुग्ध-शर्करा योग उत्पन्न हो जायेगा.’
मैंने बिना एक क्षण का विलंब किये तत्क्षण उनके सपनों के भारत के लिए अपनी उर्जा
और अपनी भाषण शैली का समर्पण देने की घोषणा कर दी.
इसके साथ ही शुरू हो गयी मेरे जीवन की एक अद्भुत ज्ञान यात्रा, जो
मुझे उनके साथ महाराष्ट्र के हर एक तालुका तक लेकर गयी. आज यह मेरा अखंड विश्वास है कि पिछले बीस साल
उनकी अद्भुत विद्वता के साये में जीना पूर्वजन्म के किसी संचित पुण्यकर्म के बिना
बिलकुल ही संभव नहीं था. केवल उनसे अपने प्रेम के कारण, मैं, जोकि एक मारवाड़ी
दुकानदार के घर में जन्मा था, किसानों के प्रवक्ता के रूप में महाराष्ट्र भर में
जाना गया. उनके चाहनेवाले अनगिनत बेहद बुद्धिमान और भावुक नेताओं और कार्यकर्ताओं
से मैं मिल पाया. उनकी प्रतिभा के बेमिसाल तराजू ने श्रेयस और प्रेयस की जंग में श्रेयस
को चुनने की पात्रता और हिम्मत मुझे प्रदान की और छिछली नारेबाजी और अध्ययनशील गरिमा
के बीच का अंतर समझने की योग्यता मुझे हासिल हुयी. उनकी प्रखरता और ओजस्विता ने
मुझे अनादि अनंत युगों की यात्रा पर निकले प्रवासी शाश्वत नक्षत्रों और अल्पजीवी जुगनुओं
के बीच के फर्क को समझने का माद्दा प्रदान किया, जिससे प्राप्त सामर्थ्य के कारण मेरा
मस्तक हर कहीं झुकने से इंकार करने लगा.
मुझे कभी-कभी लगता है कि शायद उनके समान प्रखर प्रतिभा का धनी
महाराष्ट्र की प्रतिभा उर्वर भूमि में ही जन्म ले सकता था , जिसने कभी महाराष्ट्र
माउली संत ज्ञानेश्वर और संत श्रेष्ठ
तुकाराम को जन्म दिया था, जिसने महान छत्रपति के समान संघठक और तिलक और सावरकर के
समान विद्रोहियों को जन्म दिया था. जिस भूमि की पावन गोद जहाँ ज्योतिबाफुले और डॉ
अम्बेडकर के समान बौद्धिक योद्धाओं से गौरवान्वित हुयी हो वहीं महादेव गोविन्द
रानडे और तर्कतीर्थ जोशी जैसे अध्येताओं के परिश्रम के कारण जहाँ बहस का स्तर सदा
भारत के अन्य सभी प्रान्तों से उच्चतर रहा हो.
मुगलों के खिलाफ कभी मावलों ने यहीं गनिमी कावा नामक अपनी छापामार
शैली को जन्म दिया था, जिसका उद्देश्य कम से कम नुकसान में दुश्मन को ज्यादा से
ज्यादा सताना था. उनके भी आन्दोलन का मूल अस्त्र, उनकी छापामार शैली अर्थात ‘गनिमी
कावा’ शिवाजी के लगभग ३०० साल बाद मराठी
भाषा के पत्रकारों का सबसे पंसदीदा शब्द बन चुका था. १९८४ में इंदिराजी की मौत के
बाद हुए संसदीय चुनाव में जब पूरे देश में कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर
चल रही थी, महाराष्ट्र में कांग्रेस के मंत्रियों को गांव गांव में प्रश्न पूछे जा
रहे थे और उनकी सभायें उध्वस्त की जा रही थी. १९९१
में जब राजीव गाँधी की मौत के बाद कांग्रेस के पक्ष में फिर सहानुभूति लहर निर्मित
करने की कोशिशे चल रही थी, हमारे यहाँ वसंत
साठे जैसे दिग्गज चुनाव हार रहे थे.
पांच रूपये की टोपी मस्तक पर धारण करने वाले गरीब किसानों को उन्होंने
नेहरु प्रणित अर्थव्यवस्था में होनेवाली लूट का जो अर्थशास्त्र समझाया था, उसने
कांग्रेस की देहातों में चूलें हिला दी थी. जो जनता कभी गाँधी नेहरु परिवार के
सामने लोटांगण किया करती थी, आज उसके सिपहसालारों से खुले आम प्रश्न पूछ रही थी. तब तक महाराष्ट्र में अपराजेय माने जाने वाले
शक्कर सम्राट और सहकार महर्षि उनके इस जनांदोलनों के सबसे बड़े शिकार होने लगे थे. इस
अर्थ में जिस काम को राममनोहर लोहिया की लाजवाब प्रतिभा ने कभी विंध्याचल के उत्तरी
राज्यों में अंजाम दिया था, उसी को शरद जोशी नब्बे के दशक में महाराष्ट्र में
अंजाम दे रहे थे.
कांग्रेस को देश की तमाम समस्याओं की जड़ मानने वाले ये ही शरद जोशी
राजनीती में बड़ते धर्म और जाति के असर से भी लड़ने चल पड़े और उन पर कांग्रेस को
समर्थन देने के आरोप भी लगे किन्तु वोट का गणित बिठाना उनकी तासीर में ही नहीं था.
नफे-नुकसान का हिसाब तो बनिया करता है, ज्ञान मार्ग को समर्पित यह त्यागी ऋषि क्या
लाया था जो खोने के उसे डर होता? १९९१ में जब नरसिम्हा राव के नेतृत्व में देश में
आर्थिक सुधारों की आंधी चली, वे पहले नेता थे जो उनके समर्थन में आगे आये. जब
कांग्रेस के अपने ही नेता आर्थिक सुधारों को समझने में असमर्थ थे और दूसरों को
समझाने में तो और भी असमर्थ थे, शरद जोशी ने महाराष्ट्र के अनपढ़ किसानों को उसके
फायदे समझा दिए थे. अर्थशास्त्र के मूलभुत सिद्धांतों को सरलतम भाषा में सामान्य से
सामान्य व्यक्ति को समझाने में तो मानो उन्हें विशेष प्रावीण्य हासिल था. इस अर्थ
में ज्योतिबा के बाद उनके जैसा लोक-शिक्षक शायद ही महाराष्ट्र ने पैदा किया हो. आज
गौरव से महाराष्ट्र कहता है कि यदि शेतकरी संघठन का लाल बिल्ला सीने पर लगाया एक
भी कार्यकर्ता भीड़ में बैठा हो तो अच्छे अच्छे अर्थशास्त्री बिना सोचे विचारे कुछ
भी बोलने से घबराते है. वह अदना सा कार्यकर्ता बड़े से बड़े विशेषज्ञ का अपने तर्कों
से मुँह बंद करने का माद्दा रखता है.
स्वयं रोजगार और उद्यमशीलता के प्रति शरद जोशी के झुकाव ने उन्हें सदा
आरक्षण और सबसिडी वाली अर्थव्यवस्था का दुश्मन बनाये रखा. मनुष्य के अदम्य साहस और
जिजीविषा में उनका गहरा विश्वास था. मनुष्य के भीतर उच्च आदर्शो के प्रति उठनेवाली
पुकार को लेकर वे निसंदिग्ध थे. यही कारण है कि वे किसी भी सामंत, शासक, पहरेदार
और अधिकारी को यह अधिकार देने को तैयार नही थे कि वह दूसरों को समझाए कि उनके लिए
क्या अच्छा है और क्या बुरा. “सरकार समस्या क्या
सुलझाए, सरकार यही समस्या है” उनका यह नारा आज जितना महाराष्ट्र
में गूँजता है, उतना शायद ही देश के किसी अन्य राज्य में गूँजता है. यही सोच की
विभिन्नता उन्हें अन्ना हजारे जैसों से दूर ले जाती थी, जो सख्त से सख्त लोकपाल की
बात कर रहे थे. शरद जोशी पारदर्शकता, प्रतियोगिता और परस्पर निर्भरता को मानवीय
प्रगति और उत्थान का मुख्य कारक मानते रहे, सरकार, कानून और स्वावलंबन को नहीं.
यही कारण है कि स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का विचार उन्हें रुग्ण और खर्चीला लगता
रहा. यह विचार अस्मिता तो पैदा कर सकता है, प्रतिभा नहीं. इससे कुछ दिनों के लिए
आपका मेरा खून गर्म हो सकता है किन्तु मानवीय सभ्यता इससे इतिहास के प्रत्येक
कालखंड में जख्मी और लहुलुहान ही हुयी है.
शायद इसी कारण जिन विश्वनाथ प्रताप सिंह को समर्थन देने के लिए उन्होंने
सारे महाराष्ट्र के हर गली कूचे की खाक छानी थी, उनके द्वारा जातीय राजनीति का
आगाज किये जाने पर उन्हें त्यागने के लिए उन्हें दो मिनट का भी वक्त नहीं लगा था.
विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा की गयी उस गद्दारी की चुभन अंत तक उनके कलेजे में टीस
पैदा करती रही. उन्होंने जैसे देश की दूसरी आजादी की उम्मीदों पर कालिख पोती
थी.
अपने ऐसे ही बेजोड़ विचारों के कारण अक्सर उन्हें हाशिये पर धकेलने की
कोशिशे की गयी. किन्तु वक्त उन्हें बार बार अपने बीच बुलाता रहा. मेरा मत है कि
दुनिया के हर एक मौलिक चिंतक और विचारक की तरह वे अपने समय से सदा आगे रहे और
इसलिए उनके हिस्से में सदा मंथन से निकला विष आया, जो उन्हें कंठ में धारण भी करना
था और अपने आदर्शो को बचाए भी रखना था. इस
अर्थ में वे हमारे दौर के “एक कंठ विषपायी’ नीलकंठ थे. वे अपने इस
जीवन संघर्ष में कितने सफल रहे, कितने असफल, इसका फैसला तो भविष्य करेगा ही किन्तु
मुझ जैसे अनगिनत कार्यकर्ताओं के जीवन में जो अलख उन्होंने जगा दी है, उस धरोहर से
हम सदा के लिए समृद्ध रहेंगें.
बाहर से बेहद सख्त दिखने वाले शरद जोशी भीतर से एक बेहद संवेदनशील
व्यक्ति थे. अपनी पत्नी की मृत्यु के लगभग बीस साल बाद एक दोपहर वे हमारे साथ एक कार
में बैठकर अमरावती जिले की चांदुर तालुका का वह स्थान खोजते रहें जहाँ कभी
उन्होंने अपनी पत्नी के साथ किसी दोपहर में चाय पी थी. किंतु बीस वर्षों के अंतराल
में सड़क चौड़ीकरण में शायद वह झोपड़ी हटाई जा चुकी थी. हमें उस दोपहर निराश लौटना पड़ा.
अपने आदर्शो के सख्त रास्ते पर चलने की जिद में १९८३ में ही जीवनसंगिनी को गँवा
देने का दुःख उन्हें अंतिम समय में बेचैन करता रहा. नतीजतन वे अपने जीवन के अंतिम दशक
में कुछ-कुछ धार्मिक से होने लगे थे. यही बेचैनी और जीवन के शाश्वत उद्देश्य और
नियति की खोज उन्हें २००२ में नर्मदा की गोद में ले गयी. नर्मदा की इस आध्यात्मिक
यात्रा ने उन्हें कितना संतुष्ट किया, यह तो उन्ही को पता, किंतु इसने उन्हें
जिंदगी का एक और दशक जीने की शक्ति अवश्य दे दी थी. वे अपने अंतिम क्षण तक इस
पुनीत पावन सलिला के प्रेम में पड़े रहें.
वे एक किशोर की तरह जिंदगी से प्यार करते थे इसलिए नयी पीढ़ी के साथ
सामंजस्य बिठाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती थी. मेरे हाथ में हर बार कोई न
कोई नई किताब देखने पर एक दिन उन्होंने कहा था, “जवान
आदमी हो, जिंदगी का सत्य अपने आसपास की
दुनिया में खोजो, किताबों में नहीं.” उस के बाद किताबों पर मेरी
निर्भरता कम होने लगी और जिंदगी से मेरी मुहब्बत बढ़ने लगी थी.
आज मैं अपनी जिंदगी से बेहद खुश हूँ.
जोशी साहब ! आपके साथ बिताए प्रत्येक क्षण के लिए.., आपके साथ चले हर
एक कदम के लिए ...मैं आनंद से विभोर होकर उस ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ जिसने आपके
समय और अंतराल में मुझे जन्म लेने का सौभाग्य दिया है. मुझे जन्म मेरे माँ पिता ने दिया था किंतु एक
गुरु की तरह आपने मुझे द्विज होने का सम्मान दिया है.
आपकी महान आत्मा को मेरी श्रद्धांजलि.. आपके जन्मदिन पर लिखा मेरा गीत
आज आप अवश्य सुनेंगें, यही प्रार्थना है:
जिस कारवाँ में तुम जा रहे हो
जिस कारवाँ में तुम जा रहे हो, उस कारवाँ में हमें साथ लेना
जब जिंदगी की
कहानी कहोंगे, हम भी सुनेंगे हमें साथ लेना
ये राहें ये
जंगल नदी के किनारें, युगों के सफर पर चले चाँद तारें
ये पर्वत को
धोते बादल घनेरे, ये शामों को झीलों पे चलते शिकारें
इन्हें देखने
तुम रूकोगे जहाँ पर हमें भी बुलाना हमें साथ लेना
जब जिंदगी की
कहानी कहोंगे, हम भी सुनेंगे हमें साथ लेना
ये रंगों, ये
रागों, ये खुशबू के मेले , हो अपनों की यादों में गुमसुम अकेले
वे भीगी हुयी
मुस्कराती निगाहें, वे आँचल में माँ के छिपे
पल सुनहरें
जो तुम डूब जाओ
इनके किनारें, हमें भी भिगाना हमें साथ लेना
जब जिंदगी की
कहानी कहोंगे, हम भी सुनेंगे हमें साथ
लेना
ये तीर्थों पे
अंकित प्रभु पद कथाएँ ये आँखों से बहती
परम आस्थाएँ
ये भक्ति के आँगन,
श्रद्धा के पूजन, ये शक्ति के आगे समर्पित दिशाएँ
इस पुण्यधारा
में जब तुम बहोगे, हमें भी बहाना हमें साथ
लेना
जब जिंदगी की
कहानी कहोंगे, हम भी सुनेंगे हमें साथ
लेना
दिनेश शर्मा,
पुलगांव
९१३०३२७६६४

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