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Wednesday, October 18, 2017

हिंदु जातिप्रथा और ब्राह्मणों की निंदा के पीछे का वैश्विक एजेंडा


पश्चिमी देशों के आम नागरिक शायद ही भारत के बारे में कुछ जानते हो. हाँ, एक चीज से वे सारे अवगत है, “कि भारत में एक अमानवीयजाति प्रथा है जोकि हिंदु धर्म का सबसे महत्वपूर्ण आयाम है”. अधिकांश यह भी जानते है कि ब्राह्मणनामक एक उच्चवर्णीय जाति है, जोकि उस देश की निम्नवर्णीय समझी जानेवाली जातियों का शोषण करती है, और इनमें भी अछूतों के हालात तो बेहद बदतर है. 


मुझे इस बात को अपने प्राथमिक विद्यालय में ही सिखाया जा चुका था, भले ही कुछ ही वर्षों पूर्व हो चुके नाजी जर्मनी के हत्यारे गैस चैम्बर्स, उपनिवेशवाद और दासत्व-प्रथा के अत्याचारों के बारे मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं था. १९६० के दशक के आरंभिक वर्षों में भारतीय जातिप्रथा और उसके ब्राह्मण खलनायकमेरे पश्चिमी बवेरियन स्कूल्स के पाठयक्रम का अभिन्न हिस्सा थे और आज भी हालात वही है. कुछ समय पूर्व मैंने ऋषिकेश में तीन युवा जर्मन नागरिकों से पूछा कि वे हिंदुधर्म को किस चीज को जोड़कर देखते हैं, उनका तत्काल उत्तर था- जातिप्रथा”. निश्चित ही, वे यह भी सुन चुके थे कि यह प्रथा बेहद आमानवीय है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि सारी दुनिया के स्कूली बच्चों को अमानवीय जातिप्रथाके बारे में पढ़ाया जाता है. 
क्या इसके पीछे कोई कारण, किसी एजेंडे की संभावना है
इससे कोई इंकार नहीं करेगा कि जातिप्रथा आज भी मौजूद है और आज भी अछूत जातियाँ अस्तित्व में है. और ऐसा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया में मौजूद है. आश्चर्यजनक बात है, ‘क्लासको पोर्तुगीज में जाति अर्थात कास्टकहा जाता है. वास्तव में तो यह भारतीय संज्ञा भी नहीं है.

प्राचीन भारतीय वेद चार वर्णों का जिक्र करते है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शुद्र, जोकि एक सामाजिक शरीर की रचना करते है, वैसे ही जैसे कि मस्तक, भुजा, जांघे और पाँव एक मानवीय शरीर की रचना करते है. वैसे तो यह स्वयं में ही एक बेहद खूबसूरत व्याख्या होती जो इशारा करती है कि मानव शरीर के सभी अंग अपनेआप में महत्वपूर्ण है. हाँ, यह सही है कि मस्तक को सदैव ज्यादा आदर दिया जायेगा, किन्तु क्या आप अपने पांवों की उपेक्षा करेंगें? हर व्यक्ति प्रतिभाशाली कार्य के लिए ही तो नहीं जन्मता है. कोई भी समाज किसानों, व्यापारियों और श्रमिकों के बिना कैसे खड़ा होता? सभी की अपनी-अपनी भूमिका है. और भविष्य में इस भूमिका के बदले जाने की भी पूरी संभावना होती है. 
वर्णभी अपने मूल रूप में आनुवंशिक नहीं थे. वे किसी व्यक्ति के सबसे प्रमुख चारित्रिक गुण और उसके व्यवसाय पर निर्भर थे. ब्राह्मणों का मूल कर्म था- वेदों का एकदम परिशुद्ध अंदाज में स्मरण करके उन्हें सुरक्षित रखना और आगामी पीढ़ियों को सौंपना. इसलिए उनमें सत्व गुण की प्रधानता अनिर्वाय मानी गयी और उन्हें पवित्रता का जतन करने के लिए बाकी जातियों की तुलना में अधिक कष्टपूर्ण नियमों से बंधे रहना होता था.

ब्राह्मण वेदों की पवित्रता के रक्षक और पालक थे. अतः यह समझनेलायक बात है कि वे उन लोगों को नहीं छुएंगें जो नालियाँ साफ करते हो या मृत जानवरों का चमड़ा निकालते हो, हालांकि समाज के लिए ऐसे काम करनेवाले लोग भी आवश्यक है. पश्चिम में भी लोग कहाँ उनसे हाथ मिलाना पसंद करते हैं, किन्तु क्या वहां कोई इसे मुद्दा बनाता है?

अपने सत्व गुणों के कारण ब्राह्मणों द्वारा समाज के दूसरे समूहों के प्रति अपशब्दों के प्रयोग किये जाने की भी न्यूनतम संभावना थी. आमतौर पर हर समाज में एक समूह होता है जो स्वयं को सामाजिक रूप से दूसरों से ऊपर और दूसरों को अपने से कमतर आँकता है. यह ग्रंथी सभी समकालीन समाजों में मौजूद रहती है. यह भी सत्य है कि कालान्तर में भारत में दुर्भाग्य से चार वर्ण जन्म की आनुवंशिकता से तय किये जाने लगे, ना कि कर्म की. आज ऐसे कई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र मिल जाएंगें जो शायद ही अपने वर्ण धर्म का पालन करते हों, अतः उन्हें अपने आपको अपने जन्म के वर्ण से संबंधित नहीं मानना चाहिए.

किन्तु क्या कारण है कि जहाँ भारत में समाज की इस संरचना को निरंतर लताड़ा जाता है, वहीँ पश्चिम में वहां के उच्चवर्णीय, राजसी कुलों को कोई दोषी नहीं ठहराता कि वे अपने श्रमिकों के साथ उठते बैठते नहीं है या उनके आस-पड़ौस में रहने को तैयार नहीं है
मुझे एक बूढ़े भारतीय ने बताया था कि कर्नाटक के मडीकेरी गांव और सारे देश में अंग्रेज अपने क्लबों में केवल गोरे लोगों को ही प्रवेश की अनुमति देते थे? यदि मेरी याददाश्त ठीक है, तो उसने कहा था कि क्लब के प्रवेश-द्वार के सूचना फलक पर ही लिखा होता था- कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश निषिद्ध है”. इस बात से क्यों कोई क्षुब्ध नहीं है?
क्यों कोई भी इस बात से क्षुब्ध नहीं है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी कृषिनीति ने ढाई करोड़ भारतीयों को भूखों रखकर मौत का निवाला बनने को मजबूर कर दिया था. ये ढाई करोड़ भारतीय, स्त्री, पुरुष और बच्चे, शनै: शनै: मौत की और रेंग रहे थे क्योंकि उनके पास, एक ऐसे देश में जो अंग्रेज आने से पूर्व दुनिया के सबसे अमीर देशों में शुमार था, खाने के लिए कुछ भी नहीं था? इंटरनेट पर उस दौर के तिल-तिल मरते, केवल चमड़ी और हड्डियों को दर्शाते, बमुश्किल जिंदा भारतीयों के भयावह चित्र आज भी उपलब्ध है.

क्यों कोई भी इस बात से प्रक्षुब्ध नहीं होता है कि अंग्रेजो ने दासप्रथा समाप्त होने के बाद भी अपनी बंद दमघोंटू नावों में ठूंस-ठूंस कर भारत से दीन-हीन श्रमिकों को दुनिया के कोने-कोने में भेजा था, जिनमें से अधिकांश तो यात्रा के बीच में ही मौत का निवाला बन गए और जो बच गए थे, वे गन्ने के खेतों में होनेवाले अंतहीन अत्याचारों के शिकार बन गए?

क्यों कोई हिंदुओ और विशेषकर ब्राह्मणों की उस बदहाली का जिक्र नहीं करता जो मुस्लिम आक्रमणों के कारण हुयी थी? कितने क्रूरतापूर्ण थे वे आक्रमण? अनगिनत हिंदू मार डाले गए और कितने ही गुलाम बना दिए गए. कितनी ही हिंदु नारियों ने मुस्लिम आक्रांताओं के हाथों पड़ने की तुलना में सामूहिक जौहर करके अपने प्राणों की आहुति देने का चुनाव किया था.
इसी वर्तमान में आयसिस(ISIS) के कारण हम उन घटनाओं का अनुमान लगा सकते है, जो सदियों पहले घटित हुयी होगी, किंतु बावजूद इसके वामपंथी विचारक और आदरणीयब्रिटिश सांसद इसे लेकर किंचित भी चिंतित दिखाई नहीं देते. हाँ, वे चिंतित अवश्य है भारत की घोरतम अमानवीय जातिप्रथाके बारे में.

हम इसे आसानी से समझ सकते है कि औपनिवेशिक प्रशासन ने १८७१ के पश्चात अपनी जनगणना में वर्णों की पुरानी लचीली अवस्था को सख्त बनाकर जातियों के बीच के आपसी सामंजस्य को नष्ट करने का प्रयास किया था. आज उन्ही के लोकतांत्रिक उत्तराधिकारी, भारत में जिनका कोई राजनैतिक आधार नहीं है, केवल जोड़तोड़ में प्रवीण चालाक मिडिया और अपने ही देश के संसदीय कानूनों के बल पर इस सामंजस्य को नष्ट करने पर तुले हुए है.

मेरा तर्क कहता है: जो कुछ ब्राह्मणों ने दूसरों से स्वयं को अलग रखकर या मान लो कि दूसरों का तिरस्कार करके किया था, वह ईसाई उपनिवेशवादीयों और मुस्लिम आक्रांताओं ने जो कुछ किया था, उसके सामने तो रत्ती भर भी नहीं है.

फिर क्यों जातिप्रथा के कथित अत्याचारों को इतना बढ़ाचढ़ा कर दिखाया जाता है? इसका स्पष्ट कारण तो सिर्फ उन लोगों से ध्यान बंटाना हो सकता है जिन्हें वास्तव में भारत में अतीत में किये और आज भी जारी अपनी करतूतों पर अपराधबोध महसूस होना चाहिए. निश्चित ही ये लोग ब्राह्मण तो नहीं है. आज भी कई ब्राह्मण बेहद गरीब होने के बावजूद आरक्षण व्यवस्था के कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों को मिलनेवाले फायदों से वंचित है.

जातिप्रथा और ब्राह्मणों की दुनियाभर में जारी निंदा के लिए केवल यही कारण पर्याप्त नहीं है. उनका दूसरा प्रमुख एजेंडा है- ब्राह्मणों को शर्मिंदा करना, उन्हें उनके पूर्वजों के कर्मो के लिए अपराधबोध से भरना और उन्हें वेदों की शिक्षा ग्रहण करने और उसे दूसरों को प्रदान करने के अपने ही धर्म के पालन के प्रति संकोची बनाना. उनका उद्देश्य है- वैदिक ज्ञान को भारत में से ही लुप्त कर देना, क्योंकि यह ईसाईयत और इस्लाम के लिए तगड़ी चुनौती पेश करता है. यह उन धर्मों के कथित उद्घाटित सत्यों” (Revelaed truths) को बड़ी आसानी से चुनौती देता दिखाई देता है. वैदिक ज्ञान तर्कपूर्ण है और इसीकारण यह ईसाईयत और इस्लाम के वैश्विक विस्तार के रास्ते की सबसे बड़ी रूकावट है.
दुर्भाग्य से वैदिक ग्रंथों का बड़ा हिस्सा पहले ही लुप्त हो चुका है. कांचीपुरम के भूतपूर्व शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती अपनी पुस्तक द वेदाजमें कहते है कि वेदव्यास द्वारा ५००० वर्ष पूर्व चार वेदों में विभाजित कुल ११८० शकों में से आज केवल आठ का ही उपयोग होता हैं. (मैं सोचती हूँ- क्या इंग्लैंड, जर्मनी और अन्य देशों में खोजबीन की गई तो इस संपदा में से कुछ की फिर से खोज हो सकती है?)
आज वक्त आ चुका है कि इस ब्राह्मण निंदा कार्यक्रम को विराम दिया जाये और भारतीय जातिप्रथा को मानवता के ऊपर घटित हुआ सबसे भीषण संकट दर्शाना बंद किया जाये. यह पूरीतरह बनावटी लगता है, विशेषकर तब जब आयसीस (ISIS) का उल्लेख बिना किसी भावुकता का रंग भरे या निंदा करते हुए केवल तथ्य दर्शाकर कर दिया जाता है. जैसे कि- आयसीस (ISIS) ने १९ यजीदी महिलाओं को लोहे के पिंजरे में जला कर इसलिए मार डाला क्योंकि उन्होंने आयसीस सैनिकों के साथ सेक्स करने से इंकार कर दिया था.
कुछ वर्षों पूर्व मैंने एक बूढ़े ब्राह्मण दंपत्ति को दक्षिण भारत के एक मंदिर में देखा. उनमें बेहद गरिमा थी, किन्तु वे काफ़ी कमजोर और कृशकाय थे. जब प्रसाद का वितरण हो रहा था- वे पंक्ति में मेरे सामने खड़े थे. बाद में वे उस पंक्ति में फिर से खड़े हो गए. इस बात की पूरी संभावना है कि ऐसा उन्होंने अपनी गरीबी के कारण किया था.
ब्राह्मणों को अपने पूर्वजों के प्रति अपराधबोध रखने की कोई आवश्यकता नहीं है. उन्हें तो उनपर गर्व होना चाहिए, क्योंकि केवल उनके योगदान के कारण आज भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जिसने अपने बहुमूल्य प्राचीन विवेक को, अशंतः ही क्यों ना हो, बचा कर रखा है.
हाँ उन दूसरों ने अवश्यही अपराधबोध रखना चाहिए, किन्तु वे अन्य तो बेशर्म है, वे ऐसा नहीं करेंगें. वे तो इसके बजाय वातावरण को हिंदुओं के प्रति तर्कहीन घृणा और ब्राह्मणविरोध से दूषित करते रहेंगें.


अनुवाद- एड. दिनेश शर्मा

मारिआ विर्थ एक जर्मन नागरिक है और हैम्बर्ग विश्वविद्यालय से उन्होंने मनोविज्ञान का अध्ययन किया है. वे पिछले चार दशकों से भारत में रह रही हैं. हिंदु तत्वज्ञान पर उनके लेख निम्न लिंक पर पढ़े जा सकते हैं.





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