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Saturday, June 13, 2015

क्या प्रतिभा केवल वामपंथीयों की बपौती है?



क्या प्रतिभा केवल वामपंथीयों की बपौती है?

पूना के राष्ट्रीय फिल्म और टीवी संस्थान पर टीवी के प्रसिद्ध कलाकार गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति पर संस्थान के वामपंथी झुकाव वाले विद्यार्थी इस तर्क से आपत्ति जता रहे हैं कि गजेंद्र चौहान की नियुक्ति मोदी सरकार का इस राष्ट्रीय संस्थान के कामकाज में हस्तक्षेप है और उनकी अकादमीक पात्रता महेश भट्ट, श्याम बेनेगल, अडूर गोपालकृष्णन और गिरीश कर्नाड जैसों की तुलना में कहीं नहीं ठहरती. वास्तव में महेश भट्ट की प्रत्येक फिल्म अपराधियों के उदात्तीकरण और कामुक कुंठा की अभिव्यक्ति के सिवा कौन सा संदेश देती है? क्या उनकी फिल्म इस देश के लाखों आम लोगों के जीवन संघर्ष का कहीं दीदार कराती है? क्या इस देश के दस हजार साल के गौरवशाली पन्नों का कहीं उनमें जिक्र होता है? किंतु इन वामपंथी विद्यार्थियों की नजर में वे प्रतिभाशाली है, गजेंद्र चौहान नहीं.

गजेंद्र चौहान का अपराध सिर्फ इतना है कि वे ९० के दशक के प्रसिद्द पौराणिक सीरियल “महाभारत” में युधिष्टर की भूमिका में काम कर चुके है और भाजपा के कुछ करीब है. किंतु क्या महेश भट्ट भी देश में गाँधी परिवार के करीबी नहीं थे? देश के अनेकानेक महत्व के संस्थानों पर वामपंथी झुकाव वाले लोगों को बिना किसी उपलब्धि या पात्रता के बनाये रखना और राष्ट्रवादी झुकाव वाले लोगों को कम अक्ल वाला बता कर उनकी नियुक्ति का विरोध करना, हमारी किस सोच का दर्शन कराता है?

जो वामपंथ का विचार उसके अपने जन्मस्थान रशिया और चीन से बेदखल किया जा चुका है, जिस वामपंथ पर दुनिया में स्वतंत्र विचार करने की आजादी को ही तबाह कर देने के आरोप लग चुके है, जिसके हाथ और पाँव अपने ही देशों के करोड़ों नागरिकों के खून से सने हुए है, जो आज भी नक्सलवाद के रूप में हमारी सरकारों को नासूर की तरह चुभते रहता है, आपको भारत में आज भी उस विचार की जयजयकार करनेवाले मूढ़ हर कहीं मील जाएंगें. खुद लाखों के वेतन वाली नौकरी पर कब्जा जमाए रखकर कोई सृजन नहीं करना और दूसरों की सृजनात्मकता को औसत और कमतर बता कर उस पर बहस तक से मुकरना, हमारे देश के वामपंथी विचारकों का दोधारी हथियार रहा है.

दुनिया का इतिहास गवाह है कि जहाँ जहाँ वामपंथ गया, वहाँ मानवीय स्वतंत्रता, मौलिकता और सृजनात्मकता ने अपनी अंतिम साँसें गिनी है. जीवन बुनियादी जरूरतों के आसपास ही केंद्रित रहा है, स्त्री पुरुष सबंध पशुओं से भी बदतर हाल में तब्दील कर दिए गए और समाजों की हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरायें पूरी तरह नष्ट भ्रष्ट कर दी गयी है. धर्म के मंदिर तोड़ कर उन्होंने अपने ही नेताओं के उनसे भी विशाल मंदिर बनवाए और उनकी पूजा अनिवार्य कर दी गयी. क्या किसी भी वामपंथी फिल्मकार ने इस तबाही पर कोई फिल्म कभी दुनिया को दिखाई है?

अपना एजेंडा लागु करने का वामपंथियों का एक आजमाया हुआ नुस्खा है. अपनी फिल्मों और आंदोलनों के माध्यम से परिवारों और समाजों को कमजोर करना और सरकारी संस्थाओँ को मजबूत करना. बाद में भले ही वे संस्थांए अपने भ्रष्ट आचरण से नागरिकों का जीना हराम कर दें, किंतु इससे वामपंथ मजबूत होता है, क्योंकि उसके सदस्य बढ़ते हैं. परिवार और समाज जितना संघठित होगा, वामपंथ उतना कमजोर होगा और समाज जितना कमजोर और सरकार जितनी मजबूत होती है, वामपंथ उतना शक्तिशाली और त्रासदायक हो जाता है. देश के किसी भी वामपन्थी संघठन ने आज तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया है क्योंकि सरकार के कर्मचारी तो इनकी मुख्य ताकत है.

आज देश के लगभग समस्त विश्वविद्यालयों में आपको सर्वोच्च पदों पर वामपंथी हावी मिलेंगें. क्या कोई उनसे पूछ सकता है कि क्यों आज हमारा कोई भी शैक्षणिक संस्थान विश्व के पहले पांच सौ संस्थानों में भी शामिल नहीं किया जाता? दशकों पुराने पाठ्यक्रम आज भी देश के युवाओं को पढ़ाकर उनकी जिंदगी से हर रोज खिलवाड़ किया जा रहा हैं, हर वर्ष देश के विश्वविद्यालय आस्ट्रेलिया की आबादी जितने बेरोजगारों की सौगात भारत को देते चले आ रहे हैं. किंतु उनके चलानेवालों को इससे कोई फर्क नहीं पढ़ता, उनके वेतन भत्ते चलते रहते हैं, बढ़ते रहते हैं.  

दुर्भाग्य से इस वामपंथी अधिनायकवाद के चलते हमारे देश में वास्तविक अर्थो में दक्षिणपंथी या राष्ट्रवादी विचार का जन्म ही नहीं हुआ है. हमारी प्रेरणाएँ आज भी विदेशों की ओर ताकती है. हमारा मिडिया हो या समस्त शैक्षणिक संस्थान, वहाँ की बहस में राष्ट्रवाद कट्टर लोगों की मानसिकता माना जाता है, धार्मिकता पिछड़े लोगों की जीवन शैली माना जाता है और कथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हर किस्म की औसत राजनीति को बर्दाश्त करना, उनकी दुनिया में आधुनिकता माना जाता है.

उनकी कथित धर्मनिरपेक्षता अल्पसंख्यकों से तो आग्रह करती है कि वे अपने धर्म और परंपराओं पर टिके  रहें और धर्म के नाम पर एकत्रित होकर मतदान करें किंतु बहुसंख्यक समाज से उनकी अपेक्षा है कि वह अपने धर्म और पहचान का कहीं दावा ना करें और उन्हें समाप्त हो जाने दें. हमारा मिडिया राष्ट्रवादी या दक्षिणपन्थी विचारों के प्रतिनिधि के रूप में किसी बेवकूफ बाबा, महाराज  या साध्वी को सामने ले आता है. उनके मूर्खतापूर्ण बड़बोले बयानों को समाचारों में तब्दील किया जाता है और हफ्तों उस पर बहस का पाखंड रचा जाता है. किंतु किसी भी वामपंथी असर वाले संस्थान के कामकाज या उनके खर्चो पर आपको कोई बहस या समाचार सुनने को नहीं मिलता.  देश को असली खतरा इन बाबाओं या साध्वियों से ना होकर देश का करोड़ों रुपया हर साल निगलने वाले इनके कामचोर संस्थानों से हैं.

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सृजनात्मकता से हीन दीन औसत विचारों वाले झोलाछाप बड़बोले कार्यकर्ता आपको देश को बहकाते मिल जाएंगें, सख्त से सख्त कानून बना कर देश की जनता को पुलिस, वकील और अदालतों के हवाले कर देने की जिरह करते मिल जायेंगे. किंतु देश के किसी भी प्रसार माध्यम में कोई भी वक्ता इन संस्थानों के वामपंथी नेतृत्व पर ऊँगली नहीं उठाता, उनकी रईस जीवन शैली और सादगी पर भाषणों के विरोधाभास पर कोई शक नहीं करता क्योंकि देश में वे बुद्धिमान और प्रतिभाशाली माने जाते है, या मिडिया के माध्यम से ऐसा वातावरण बन दिया जाता है कि लोग इन्हें प्रतिभाशाली माने.   

आज नेहरु की गलतियों की सजा देश भुगत रहा है. गांधीवाद की सादगी और कम खर्च वाली जीवन शैली को हमारे सामाजिक जीवन और सरोकारों से धकियाया जा चुका है, हमारी धार्मिक जीवन शैली को पिछड़ापन माना जा चुका है और देश के भविष्य को निर्माण करनेवाले संस्थान दूसरों की मेहनत को चूसने वाले कथित विचारको के हवाले सौंपे जा चुके है. देश और उसके राष्ट्रीय संस्थानों को यदि कहीं कोई भी खतरा है तो वह इन वामपंथी विचारकों से हैं ना कि देश की प्राचीनतम जीवन शैली को मानने वालों से.  

काश! ये नासमझ विद्यार्थी जितनी जल्दी इस सत्य को समझ लेंगें उतना इस देश को उनकी प्रतिभा से फायदा होगा.

दिनेश शर्मा

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