हम होंगे फिर से एक साथ
एक दिन जरूर आएगा
जब गम के बादल छँट जाएंगें
तम के मौसम कट जायेंगे
विश्वास का सूरज उभरेगा
दूर क्षितिज पर किसी
प्रभात
हम होंगे फिर से एक साथ.
एक दिन जरूर आएगा
जब प्रेम से होंगे प्रदीप्त
हमारे रास्तें, हमारी
दिशायें,
कल भले हम रहें, ना रहें
धरा पर रहेगी हमारी कथायें.
वह दिन जरूर आएगा
जब रिश्तें तोले नहीं,
जीये जाएंगें
सत्य में, सुंदर में, चिरंतन में,
भावनायें कुचली नहीं, उगाई जायेगी
अनुभूतियों के विराट उर्वर
चमन में.
मेरे मित्र,
उसी गरिमामय प्रभात की
प्रतिक्षा में
मैं आता रहूँगा बदल कर
रूप
कहीं बनके छाया तो कहीं धूप
कभी प्रतिस्पर्धी, कभी
प्रतिरूप
मैं उडूंगा दूर तक
तुम्हारी उड़ानों में
शिखरों पर, साहिलों और मैदानों में
और हम देखेंगें साथ साथ
हम जानेंगें साथ साथ, कि
क्या फर्क होता है बस्ती
में, वीरानों में
क्या अंतर है आकाश में, तहखानो
में
हम खोजेंगे यह सृजन सत्य
कि क्यों नियंता ने हमको
अधूरा बनाया,
किसी की तलाश में जगत को
बसाया.
किसतरह शब्दों में बह
उठी भावधारा
किसतरह मृत्यु को जिंदगी
ने संवारा
कैसे जकड़न में धोखा है विसर्जन
का
कैसे सृजन सहोदर है परिवर्तन
का
मेरे मित्र, वह दिन जरूर आएगा
जब हम
किसी नदी के उद्गम पर बिछड़ेंगे
और अनगिनत लहरों पर
अनगिनत नावों में भटकते
उसके मुहाने पर फिर मिलेंगें
शायद उस दिन अवश्य
उसकी विराट और उत्ताल तरंगों
में
साथ साथ डूबते उतराते
हमारे चेहरे, सदियों से
बिछड़े
जाने पहचाने अपनेपन
और विश्वास से खिलेंगे.
दिनेश शर्मा
