माँ
आज से कुछ वर्षों पहले दुनिया में एक प्रतियोगिता हुयी.
प्रतियोगिता का विषय था उस शब्द की खोज करना, जो दुनिया की
समस्त भाषाओं में सबसे लोकप्रिय शब्द हो. जब सारी दुनिया के भाषाविद् बैठे और
उन्होंने दुनिया के उसे सबसे लोकप्रिय शब्द के बारे में जाना तो वे भी दंग रह गए-
क्योंकि, वह शब्द था – माँ.
दुनिया की कोई भी भाषा हो- लेकिन हर उस भाषा में माँ से महान और
लोकप्रिय कोई शब्द नहीं पाया गया.
बच्चा जब अपने तुतलाते बोलों से बोलना सीखता है, तो उसके होठों से जो पहला शब्द निकलता है, वह होता
है, म अर्थात माँ और फिर उसके बाद वह बोलता है, मम अर्थात पानी.
वही हमारी पहली श्रोता और वही हमारी पहली वक्ता है. वह हमारे जीवन
की पहली ध्वनि, पहला स्वाद, प्रथम स्पर्श और
पहला प्रेम है. वह हमारी अभिव्यक्ति और अस्तित्व की यात्रा का पहला और सबसे महान
कदम है.
बच्चा केवल गंध से अपनी माँ को पहचान सकता है. इसलिए जैसे ही वह
कहीं इधर उधर जाती है, वह बेचैन होकर रोने लग जाता है क्योंकि उसके नाक
की ग्रंथिया उसे सूचना दे देती है कि कुछ तो भी यहाँ से गायब है.
उसका होना मानो हमारी जिंदगी का सबसे महानतम आश्वासन है.
हम महाराष्ट्र वाले अपने संतो को भी माउली कहकर बुलाते है क्योंकि
अब इससे ज्यादा अपनापन और मान देना भी संभव नहीं हैं. किसी की महानता और करुणा को
माउली बोल दिया तो मानो बात पूरी हो गयी. अब और आगे जाना मानो संभव ही नहीं है.
१९६६ में प्रदर्शित हुयी हिंदी फिल्म दादी माँ में महेंद्र कपूर ने
माँ की तुलना ईश्वर से करते हुए गाया था:
“उसको नहीं देखा हमने कभी पर इसकी जरूरत क्या होगी.
ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी.
इंसान तो क्या देवता भी आँचल में पले तेरे
है स्वर्ग इसी दुनिया में कदमों के तले तेरे
ममता ही लुटाए जिसके नयन ऐसी कोई मूरत क्या होगी.
ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी.”
उर्दू के किसी शायर ने माँ की दुआओं पर कहा है:
ना जाने कौन मेरे हक में दुआ पढ़ता है..
मैं डूबता भी हूँ तो समन्दर उछाल देता है....
सदियों से अपने-अपने हिस्से के संघर्षो से जूझ रही मानवता ने माँ
के आँचल में ही पनाह ली है. घर के शिवाले में बैठी माँ ने हमारे संघर्ष को हर रोज
नयी प्रेरणा दी है. वह हमारी अनगिनत यात्राओं का प्रस्थान बिंदु है. और वही हमारी
जिंदगी का चरम विश्राम रही है. उसकी रस-भरी भय-मुक्त छाया से महान आश्रम और क्या
हो सकता है?
इसलिए ईश्वर भी जब कभी अपनी निर्मिति से थक हार कर चैन की साँस
लेना चाहता होगा तो वह भी अपनी माँ की ही पनाह में जाता होगा.
दुनिया के कई आदिवासी कबीले बच्चे के जन्म के समय उसकी माँ से जुडी
जो नाल होती है, उसे काटने के बाद धूप में सुखा कर संभालकर रखते
है. भविष्य में उसे कोई भी घातक बीमारी हो तथा और कोई दवा असर नहीं कर रही हो तो
वे उस नाल को घिसकर उसका रस उस व्यक्ति को पिला देते है. वह नाल उसके लिए जीवन अमृत
का काम करती है. उस नाल का असर, उसके शरीर के विषाक्त तत्वों
को बाहर निकाल फेंकता है.
यही कुछ हमारे चरित्र दोष के साथ भी होता है. आपने कोई भी अपराध कर
लिया हो, कोई भी ऐसी बात जो आप किसी और के सामने स्वीकार ना
कर सको, जो आपको भीतर ही भीतर निचोड़ रही हो, जो आपके दिन का चैन और रातों की नींद को उड़ा दे, बस
एक बात कीजिये, अपनी माँ के सामने उसे स्वीकार ले. एक क्षण
मात्र में आप अपने ही भीतर के अपराध बोध से मुक्त होकर समाज के सामने फिर से खड़ा
होने का साहस पैदा कर सकते है.
उर्दू के लोकप्रिय शायर मुनव्वर राणा कहते है
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
वे आगे कहते है
हादसों की गर्द से ख़ुद को बचाने के लिए
माँ ! हम अपने साथ बस तेरी दुआ ले जायेंगे
आज की दुनिया इसलिए परेशान नहीं है कि उसके पास पैसा, प्रतिष्ठा या पद-नाम नहीं हैं. सामान्य से सामान्य आदमी के लिए इतना पैसा,
इतनी प्रसिद्धि के साधन और इतने पद-नाम विश्व के समूचे इतिहास में
कभी भी उपलब्ध नहीं थे, जितने आज है. हमारी समस्या है कि हम
माँ, मातृभूमि और मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं. हम जितना
दूर हो रहे हैं उतना निराशा का अंधकार हमें अपने साये में दबोचने को आतुर हुआ जा
रहा है.
यही संघर्ष पर्वतराज कैलाश के आँगन में मानवता के उषाकाल में भी
हुआ था. गणेश और कार्तिकेय में कौन महान है, जब इसका फैसला
लेने का वक्त आया तो सारी दुनिया का चक्कर लगानेवाले कार्तिकेय को पराजित होना पड़ा
और केवल अपनी माँ और पिता की परिक्रमा लगानेवाले गणेश जीत गए.
उसके बाद आज तक कोई कार्तिकेय नहीं जीत पाया है.
वे सारे लोग जो विश्वविजेता सिंकदर बनने की यात्रा पर निकले थे, कहीं गुमशुदा की तरह रेगिस्तानो में समाप्त हो गए. और जो गाँधी, तिलक, विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ मातृभूमि और
मातृसंस्कृति की रक्षा के लिए उठे, वे महात्मा, लोकमान्य और महाकवि कहलाये.
अपनी माँ जीजाऊ के कहने पर महाराष्ट्र के महान छत्रपति ने मानो
भारत का सारा इतिहास ही बदल कर रख दिया था. आज महाराष्ट्र, मराठी और मराठा इतिहास माँ-बेटे की इस महान जोड़ी का जितना कर्जदार है,
उतना किसी और का नहीं है.
सलीम जावेद की पटकथा पर बनी फिल्म दीवार में फिल्म में बिगड़े हुए
बेटे का रोल कर रहे अमिताभ अपने पुलिस वाले भाई शशी कपूर से पूछते है: 'आज मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, बैंक बॅलेन्स है, तुम्हारे पास क्या है?'
जब शशी कपूर जवाब देते है कि “मेरे पास माँ
है" तो सारा सिनेमा हाल तालियों से गूंज उठता था.
विज्ञान और समृद्धि के शिखर पर जाते हुए आज यही प्रश्न हमारे दौर
की मानवता के सामने है.
क्या हमारे पास माँ है?
जिस किसी के पास इस यक्ष प्रश्न का उत्तर है, वह बचा लिया गया समझो.
और जिसने अपनी माँ और उसका आशीर्वाद गँवा दिया, समझो कि उससे विपन्न और दरिद्र इस धरा पर और कोई नहीं है.
दिनेश शर्मा
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