Thursday, August 16, 2018

अटलबिहारी: नेहरु पर्व के बाद का राष्ट्रिय महोत्सव



आज जिस सत्य को कान सुनना नहीं चाहते थे, दृष्टि देखना नहीं चाहती थी, अनुभूति मानना नहीं चाहती थी, वह आकस्मिक क्षण आ ही गया. एक व्यक्ति जो ग्वालियर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में गुलाम भारत में १९२४ में जन्मा था, और जिसकी वाणी और प्रखर ओजस्वी शैली ने जिसे आजाद भारत के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार करा दिया था, आज अपने चाहनेवालों को अलविदा कहकर चला गया. आज अटलबिहारी नहीं रहे हैं और उनके साथ ऐसा बहुत कुछ नहीं रहा, जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत थी.
उसका जाना गरिमा, लाज शर्म, ईमानदारी, प्रतिस्पर्धी के प्रति सम्मान और असहमति को भी जगह देनेवाली भारतीय संस्कृति के विराट अरण्य में के एक और विशाल छायादार पेड़ के टूट जाने जैसा है. आज जब शुद्रता, कदाचार, और असहनशीलता हमारे देश की राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों का राष्ट्रिय स्वभाव बन चुका हो, उनका जाना किसी शास्त्रीय संगीत की महफिल के अचानक उठ जाने जैसा है.
वे २७ मई १९६४ को जवाहरलाल नेहरु के निधन के बाद के चार दशकों में भारत के राजनैतिक आकाश पर अपने निजी आकर्षण और उर्जा के कारण छाये रहे दो सबसे बड़े हमारे जननायकों में एक थे, मेरी दृष्टी में दूसरी जननायक निसंदेह श्रीमती इंदिरा गाँधी थी. जहाँ इंदिराजी सत्ता पक्ष का प्रतिनिधित्व करती रही, वहीँ अटलबिहारी विरोधी पक्ष को वह गरिमापूर्ण आकर्षण मुहैया कराते रहें. अटलजी की पार्टी को उन दिनों में भले ही वोट नहीं मिले हो, किन्तु हमारा बचपन और किशोरपन उनके भाषण सुनने के लिए सैकडों किलोमीटर की यात्रायें करने से भरा रहा. भारतीय राजनीति में शायद अटलजी एकमात्र ऐसे नेता थे, जिनका भाषण सुनने के लिए लोग जाति, धर्म और भाषा की दिवारें लाँघ कर जाते थे. वर्धा हो, नागपुर हो या अकोला हो, हम रात्रि की ट्रेन से मुफ्त में यात्रायें करते,दूसरे दिन उनका भाषण सुनते और फिर हफ्तों उसकी चर्चा करतें.
उनके शब्द ओजस्वी होते हुए थी कटुतापूर्ण या विरोधियों के प्रति अपमानजनक नहीं थे. उनकी शैली काव्यमय थी और शब्द तो मानों उनके मित्र और सखा ही थे, जो जब जरूरत हो, उनके साथ हो लेते. उन्हें सुनना सदा हमारी फंतेसी का एक अविभाज्य हिस्सा रहा. जितना सम्राट अकबर मुस्लिम था, उतने ही वे हिंदू थे. मुझे आज भी लगता है कि पिछली सदियों में जिन लोगों ने वास्तविक अर्थो में हिंदुस्थान को जाना समझा है, उनमें सम्राट अकबर, राज कपूर और अटलबिहारी निसंदेह अग्रणी रहेंगे. इसलिए उनमें वह सारा कुछ श्रेष्ट दिखाई देता है, जो हमें हमारे भारतीय होने का अभिमान देता है. उनमें विशिष्ट किस्म की भारतीय गेयता थी, अल्हड़ता थी. उनका बिंदासपन राजनीति की आपाधापी के बीच भी उनके चाहनेवालों को एक सुकून पहुंचाता था. भाषण के दौरान उनके ठहराव (पॉज) सुननेवालों को पहले तो आकुल और पश्चात चमत्कृत कर देते थे.
हिंदू धर्म अपने मूल अर्थ में वैसे भी कभी किसी के विरोध में नहीं रहा है. इसलिए हिंदुओं ने कभी किसी को मिटाना नहीं चाहा, बदलना नहीं चाहा. जीवन की विविधता का सम्मान इसकी मूल मान्यताओं में से एक रहा है. यह एक मस्ती से भरा, गीतों से भरा, तीर्थो की यात्रा करता कारवां है, जो आपको अपने ही अविष्कार का अवसर प्रदान करता है. अटलजी में इसका प्रतिबिंब अपनी पूरी प्रखरता से दिखाई देता है. वे राजनीति के जैसे रुक्ष प्रदेश में होते हुए थी अपनी ही मस्ती में चलते रहें. गाते रहें, और दोस्तों, दुश्मनों सभी को अपने अमृतपन का प्रसाद बांटते रहें. वे हिन्दुवादी राजनीति के पुरोधा रहें किन्तु मंदिर में फेरे लगाता, पूजा करता उनका कोई फोटो हमारी स्मृतियों में नहीं है. कई अर्थो में वे बेहद आधुनिक व्यक्ति रहें, जिसने सदा अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया था. भीतर से वे स्वयं एक बेहद रोमांटिक प्रेमी ही रहें हैं. वे हिंदी भाषा के सबसे चहेते वक्ता रहें किन्तु दक्षिण में भी लोकप्रिय रहें. उनका पहनावा सदा पंरपरागत भारतीय रहा, किन्तु देश की तरुणाई से उनकी सदा नाल जुडी रही.
भारतीय विविधता पिछले दशकों में जितनी उनमें अभिव्यक्त हुयी, उतनी शायद ही किसी अन्य नेता में हुयी होगी. इसीलिए पोखरण का अणु विस्फोट करते हुए उनके एक ओर ईसाई जार्ज फर्नांडीस, दूसरी ओर मुस्लिम अब्दुल कलाम दिखाई देते है, और उस विस्फोट का गोपनीय कोड था, “लाफिंग बुद्धा” (अर्थात हंसते हुए गौतम बुद्ध). देश की शक्ति और सामर्थ्य का उदघोष करने के उस क्षण में हमारी राष्ट्रिय विविधता को इससे बड़ी सलामी और क्या हो सकती थी!
आज देश की हिन्दुवादी हो या धर्मनिरपेक्ष राजनीति, दोनों ही पटरी से पूरी तरह उतर चुकी है. आज जहाँ हिन्दुवादी राजनीति रोज नए दुश्मन तलाश रही हैं,वहीं धर्मनिरपेक्ष राजनीति राष्ट्र की मुख्य धारा को ही झुटलाना चाहती है. अल्पसंख्यकवाद को धर्मनिरपेक्षता का जामा पहनाने से एकाध चुनाव भले ही जीत लिया जाए, किन्तु इससे बहुसंख्यकों को एक होने की प्रेरणा मिलती है, जो अंत में अल्पसंख्यकों को ही महँगी पड़ती है. आज हम कभी नहीं थे, इतने प्रतिक्रिया वादी हो चुके है. सामनेवालों की तुच्छता का मुकाबिला करने के लिए हमने अपने भीतर की श्रेष्टता को दबा कर अपने भीतर की शुद्रता को खुली छूट दे दी है. आज देश में हर कोई अपने श्रेष्ठतम को परदे में ढंकने और अपने शोषित होने, पिटे जाने, कुचले जाने को ही अपनी योग्यता बताने में गर्व कर रहा है. ऐसा देश और भले ही किसी का हो, चाणक्य, शिवाजी, विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ, अरबिंद घोष, लोकमान्य तिलक और गाँधी का तो निसंदेह नहीं हो सकता है. ऐसा देश दोषारोपण तो कर सकता है, निर्माण नहीं कर सकता है.
ऐसे माहौल में अटल जी अवश्य याद आयेंगे. वे हमारी स्मृतियों को सदा अपनी सादगी, मुस्कराहट और कविताओं के साथ तरोताजा बनाते रहेंगे.
दिनेश शर्मा

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