"जहां जहां चरण पड़े गौतम के"
वियतनाम के बौद्ध धर्मगुरु तिक् न्यात ह्न्ह की लिखी हुई इस पुस्तक के रूप में मेरे जैसे नगण्य और शुद्र व्यक्ति के जीवन में गौतम बुद्ध का पदार्पण हुआ था. उससे पूर्व मैं ओशो के माध्यम से गौतम बुद्ध के खूबसूरत जीवन की तीर्थयात्रा करके आ ही चुका था. किंतु मुझे भीतर से गौतम बुद्ध के चरणों में झुकाने का काम इसी महान पुस्तक ने किया था.
२० वर्ष पूर्व अपनी कुछ भावनात्मक गलतियों के कारण मैं अपने ही आप से भीतर ही भीतर जूझ रहा था. राह चलते क्रोध में मैं अपने पांव पटकता था, रात को सोते समय अपनी गलतियों के ऊपर शोक करता था और यू लगता था जैसे इसी वेदना के साथ मुझे अपने जीवन की खूबसूरती को खत्म होते देखना पड़ेगा.
ऐसे ही एक दिन वर्धा रेलवे स्टेशन पर किताब की दुकान पर खड़े खड़े गौतम बुद्ध “जहां जहां चरण पड़े गौतम के” के रूप में मुझे मिले. किताब घर आ गयी, किन्तु कई हफ्तों तक मैंने उसे हाथ नहीं लगाया. मैं उसे रोज देखता और किसी और दिन पढ़ने का निश्चय करके वापस रैक में रख देता. फिर एक सुबह मैंने उसे पढ़ना शुरू किया. एक एक पन्ना पलटता गया और मैं इस किताब के माध्यम से सदियों पुराने महान भारत के इस महान पुत्र के एक-एक चरण की तीर्थ यात्रा में तिरोहित होता चला चला. ऐसे लगता मानो उनका प्रिय शिष्य आनंद और कोई नहीं, मैं ही था. गौतम बुद्ध रोज मुझसे बातें करते. मुझे झिड़कते और फिर असीम अनुराग से संभाल लेते.
८७ वर्ष के गौतम बुद्ध के जीवन में पहले के ४० वर्ष ज्यादा मायना नहीं रखते, किंतु बाद के वर्षों में उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया, जिस ढंग से उन्होंने हासिल किया और जिस ईमानदारी के साथ उन्होंने उसे दुनिया के सामने प्रस्तुत किया, उसने पूरी दुनिया में उनके धर्म की पताका पहरा दी. उनके पहले के धर्मों की मान्यताओं और उन्हें हासिल अनुभूतिजन्य सत्य में एक बुनियादी अंतर उनके आत्मज्ञान के साथ शुरू हुआ. यह एक ऐसा ज्ञान था, जो मन और बुद्धि की पीड़ा से मनुष्य मात्र को मुक्ति दिलाने वाला था. प्रतिशोध और ईर्ष्या जैसी रुग्णताओं से उपर उठाकर हमें मनुष्य होने की गरिमा प्रदान करने वाला था. यह एक ऐसा धर्म था, जिसने न केवल मनुष्यों के आपसी रिश्तों बल्कि निरीह पशुओं और पेड पौधों के साथ भी हमारे रिश्तों को पूरीतरह बदलकर रख दिया था.
अपने भीतर की मानसिक तकलीफों से मुक्ति पाने के बाद मैंने इस किताब को अपने दोस्तों को उनके जन्मदिन पर भेंट करना शुरू किया. आज तक यह पुस्तक मैं अपने ५० दोस्तों को भेंट कर चुका हूं. आज से कोई १०-१२ वर्ष पूर्व मेरी छोटी बहन विजया को भी मैंने यह पुस्तक भेंट की थी. भेंट करते समय मैंने उसे कहा था कि यह पुस्तक केवल मन की वेदनाओं को ही शमित नहीं करती, बल्कि किसी शारीरिक व्याधि से उपजे दर्द को भी हर लेने की ताकत इसमें है. एक दिन उसने पुस्तक पठन के बीच में ही फोन करके रुंधे गले से मुझे धन्यवाद कहा. हर नए पन्ने के साथ उसकी वेदना शमती चली गयी और मन प्राण पुलकित होते चले गए. खिड़की से बाहर की दुनिया अब पहले जैसी कहाँ रहनेवाली थी, क्योंकि उसे देखने का नजरिया ही बदलने जा रहा था.
आज से ६ साल पहले नागपुर में अपने दोस्त धम्मदीप गजबे के साथ मैंने कुछ व्यापारिक प्रयोग शुरू किये थे. ऐसे ही किसी सुप्रभात में मैंने यह पुस्तक उसे भेंट की. एक रात नागपुर से पुणे जाते समय रात को २.३० बजे उनका फोन आया. उसकी आवाज भर्राई हुई थी. मैं समझ गया कि वह किताब के किस पन्ने पर आकर रुक गया होगा और मुझसे वह चरम वेदना साझा करना चाहता है. वह पृष्ठ था, गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के उस क्षण का, जब पाठक पूरी तरह से स्तब्ध हो जाता है, ध्यान में बैठता है और उस महान आत्मा को पूर्ण आदरभाव के साथ विदाई देता है. किताब का वह पृष्ठ हमें उस दौर में लेकर चला जाता है, जब भारत के इस महान पुत्र ने अपने शानदार जीवन को पूरीतरह से जीने के बाद उसे अलविदा कहा होगा. धम्मदीप ने मुझे उस किताब को भेंट करने के लिए अश्रुपूर्ण अंदाज में शुक्रिया कहा और उसके बाद उस किताब को उसने भी कई अपने कई दोस्तों को भेंट किया.
भारत के महान सांस्कृतिक इतिहास का जो भी अमृत है, वह सारा कुछ आपको गौतम बुद्ध में मिलेगा. भारत का स्त्रैण स्वभाव, भारत का रचनात्मक सौंदर्य, भारत की गहन गंभीरता और भारत का भीतरी गरिमापूर्ण नैतिक उल्लास, आपको बुद्ध के जीवन में मिलेगा. गौतम बुध का जन्म हमें शुद्र महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठाकर जिंदगी की बुनियादी खूबसूरती को समझने की प्रेरणा देता है. हम बुद्धचरित्र की यात्रा पर निकलने के बाद दूसरों के प्रति ज्यादा मित्र भाव से पेश आते हैं, दुनिया को देखने का हमारा नजरिया ज्यादा करुणामय हो जाता है. बुद्ध का धर्म दूसरों से प्रतिशोध लेने या उन्हें प्रभावित करने में नहीं, बल्कि प्रकाशित करने में विश्वास रखता था. और इसीलिए उन्होंने मूक हिंसक जानवरों को भी अपने प्रेम से प्रकाशित कर दिया था. मदमस्त पागल हाथी हो या हिंसक अंगुलिमाल, सभी उनकी गरिमापूर्ण मुस्कुराहट के सामने समर्पित हो सकते थे क्योंकि उनके चरम आकर्षण में एक सुकून था, जिंदगी का एक आश्वासन था.
गौतम बुद्ध ने अपने जीवन में कभी किसी को बदलने की कोशिश नहीं की. किंतु शायद वे भारतीय भूमि पर जन्में अकेले ऐसे पुरुष थे, जिनके भयरहित महान पुरुषार्थ ने समूचे एशिया और उनकी अपनी जन्मभूमि भारत को जिस अंदाज में बदला है, उनके पहले और बाद में शायद ही किसी अन्य ने उस तरह से बदला होगा. और सबसे चकित करनेवाली बात यह थी कि इस बदलाव के लिए उन्हें तलवार का सहारा या दवा और रिश्वत का सहारा नहीं लेना पड़ा. ना उन्हें किसी को धमकाना था, और ना ही खरीदना.
आज बुद्ध पूर्णिमा के इस महान दिन पर मैं भारत के उस महान पुत्र के चरणों में नमन करता हूं और अपने जीवन में उनकी मौजूदगी के लिए मैं ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करता हूं.
मैं इस बात से गौरवान्वित हूँ कि मैं उस मिट्टी में पैदा हुआ हूं, जहां कभी गौतम बुद्ध के चरण पड़े थे.
बुद्धम शरणम गच्छामि:धम्मम शरणम गच्छामि:
संघम शरणम गच्छामि:
दिनेश शर्मा, पुलगांव.
