महिला प्रश्न और शरद जोशी
शेतकरी संघठन के प्रणेता शरद जोशी दिनांक ३ सितंबर को अपनी जिंदगी के आठ दशक
पूरे कर रहे हैं. आपातकाल के संक्रमणकाल के बाद जब देश में क्रांति और बदलाव के
नाम पर कई अजूबे जन्म ले रहे थे, महाराष्ट्र की प्रतिभा संपन्न भूमी ने अपने स्तर
पर किसानों के जीवन की चिरस्थायी त्रासदी का हल खोजने की कोशिश की थी. डेढ़ शताब्दी
पहले यही प्रयास ज्योतिबा फुले भी कर चुके थे. उलट पुलट का यह वह दौर था, जब
वामपंथ की असफलता क्षितिज पर दिखाई देने लगी थी, समाजवादी राजनीती अपने-अपने जन्म
स्थानों पर मजबूत जातियों का आश्रय खोज रही थी और हिन्दूवादी राजनीती का जन्म होना
बाकी था. उस नितांत प्रेरणाहीन दौर में शरद जोशी उठे और उनके साथ उठा था सीधेसाधे
मराठी मानूस के भीतर का वैश्विक कालपुरुष.
शरद जोशी ने नारेबाजी नहीं की, वे दूसरों के विचारों की फंतासी में नहीं
भटके. उन्होंने पूना के अम्बेठान में स्वयं खेती की, खेती में मजदूरी करने वाले
मजदूरों और उनकी महिलाओं के साथ खेती के प्रत्यक्ष अनुभव साझा किये और अपने उन्ही
अनुभवों की शिदोरी साथ में लेकर जब वे अपनी उपज को बाजार में बेचने आये, एक क्रूर
सत्य से उनका साक्षात्कार हुआ. सत्य यही था कि नेहरूवादी विकास माडेल में किसानों
का शोषण कोई हादसा नहीं, एक सोची समझी सरकारी योजना का हिस्सा है. इस अनुभव से यह
सत्य भी उद्घाटित हुआ कि सरकारें महज एक अनिवार्य बुराई मात्र है, वे समाज को ना
तो बदल सकती है ना ही सुधार सकती है. अत: वे जितना कम या सीमित हो उतना मानवीय
प्रतिभा अपने अंतहीन सपनों की यात्रा पर निकल सकती है. जहाँ जहाँ सरकारे मजबूत होगी, वहाँ वहाँ का समाज
उतना दरिद्र होगा. शरद जोशी ने यह सत्य उस समय उद्घाटित किया था जब सोव्हियत रूस
का पतन होना बाकी था और चीन के भीतर की भयानक खबरें अभी बाहर आयी नहीं थी.
इन्हीं प्रत्यक्ष अनुभवों ने शरद जोशी के स्त्री संबंधी विचारों को भी घड़ा
था. जब बीजिंग में वैश्विक महिला सम्मेलन हो रहा था और पूर्व से पश्चिम तक समूचे
विश्व में नारी मुक्ति के उग्र नारों का शोर सुनाई दे रहा था, शरद जोशी ने महाराष्ट्र
में बीजिंग विरोधी महिला परिषद का आयोजन किया. उन्होंने पहली बार किसानों और
उद्यमियों की महिलायें क्या सोचती है, इस सत्य को दुनिया के सामने रखा. शरद जोशी
के चिंतन की महिलायें पुरुषों से मुक्त नहीं होना चाहती थी, वे उत्पादन की प्रक्रिया
में अपनी मेहनत का सम्मान चाहती थी. उसका सपना आजादी का नहीं, बल्कि पुरुष के जीवन
में गरिमापूर्ण उपस्थिति का था. उनके चिंतन की महिला के लिए उसकी प्रेरणा के बिना उसका
पुरुष और अपने पुरुष के उद्यम के बिना वह स्वयं अधूरी थी. वे दोनों एक दूसरे को
पूर्ण करनेवाली ताकतें थी, और इसलिए उन्हें एक दूसरे के साथ में रहने का तरीका
समझना ही पड़ेगा और साथ साथ एक दूसरे की उन्नति का साधन बनना होगा.
शरद जोशी के चिंतन की नारी अपनी कथित आजादी के नाम पर मनुष्यता ने अपनी सृजनात्मकता
से जो कुछ भी आज तक अर्जित किया है उसे दांव पर लगाना नहीं चाहती बल्कि अपने
परिवार में ही रहकर एक नैतिक जीवन जीते हुए भावी पीढ़ी का निर्माण करना चाहती है.
उसके लिए पति और ससुरालवालें असली दुश्मन नहीं थे बल्कि शराब के अड्डे चलानेवाले,
लॉटरी और मटके की दुकान चलानेवाले और महिलाओं का अश्लील निरूपण करके मनुष्य की
प्रतिभा को तबाह करने वाले लोग असली
दुश्मन थे. इसलिए शरद जोशी के चिंतन की महिला अपने पतियों के खिलाफ उग्र नारे
लगाती बाहर नहीं निकली बल्कि उसने शराब के अड्डों पर धरने दिए और सरकार को उन्हें
बंद करने के लिए मजबूर किया. उनके चिंतन की महिला पुराणों की सावित्री की तरह अपने
पति को यमराज के भी चंगुल से निकालने का इरादा रखती थी, उसे त्यागकर अपने लिए कोई
नया स्वर्ग निर्मित नहीं करना चाहती थी.
वह जानती है कि “भारत के उपर इंडिया के हमले” में उसका पति भी घायल है, टूटा
हुआ, परास्त और हतबल है. वह देख रही थी कि शहर की भाषा, शहर के कानून और शहर के
सरकारी कारकून किस तरह उसके पति के श्रम की कौड़ी मोल बोलियाँ लगाते है और किसतरह
उसे बेवकूफ साबित करने पर तुले है. इसीलिए गाँव की वह महिला इंडिया के बनाये
कानूनों से उतनी ही दुखी और शोषित है, जितनी कि उसके परिवार के अन्य लोग. उसके लिए
सरकार, पुलिस और अदालतें शोषण से मुक्ति देनेवाले तारणहार ना होकर पति के साथ उसके
भी साझा दुश्मन है क्योंकि ये तबके उन दोनों की मेहनत से उपजे उत्पादन पर डाका
डालने वाले सरकारी मान्यताप्राप्त दस्यु गिरोह मात्र हैं. समस्त कानूनों के प्रति शरद जोशी की सोच का
अंतर्भूत तिरस्कार उन्हें हिंद स्वराज्य से झलकते गाँधी के करीब-करीब लेकर जाता
है. कभी डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने काँग्रेस से यही प्रश्न किया था, “कैसी सरकार और
कौनसी आजादी? यदि आपकी कथित आजादी के बाद उच्च वर्ग शोषक और दलित वर्ग शोषित ही
रहनेवाला हो, तो हम क्यों तुम्हारे स्वतंत्रता समर में शामिल हो? हम तो तुम्हारी
आजादी के बाद लुटने ही वाले है, तुमसे बेहतर तो ये अंग्रेज है, जो कम से कम हमें
सुरक्षा तो दे रहे है.”
ठीक यही प्रश्न शरद जोशी ने नेहरू और इंदिरा गाँधी प्रणित काँग्रेस से
किया और अपने लाजबाव आँकड़ों से यह साबित कर दिया कि नेहरु की शहर समर्थक और
उद्योगों को पोषित करनेवाली राजनीति में ही उजड़ते और जर्जर होते ग्रामीण भारत का
अपराधी छिपा था. फिर उनके चिंतन की स्त्री उन अपराधियों के साथ किस तरह खड़ी रहती?
आश्चर्य की बात यह है कि जो स्त्री शरद जोशी को दिखाई दी वह किसी स्वदेशी
विचारक, समाजवादी या वामपंथी को क्यों नहीं दिखाई दी? बीजिंग महिला परिषद के द्वारा
तय दायरे में हमारी सरकारें कानून बना बना कर पुरुष विरोधी अदालतों को मजबूत करती
रही और उनके बोझ से हमारी सदियों पुरानी पारिवारिक संस्था ध्वस्त होती चली गयी. आज
बड़े बुजुर्गों, साझा रिश्तेदारों-मित्रों को मानो हमारे घरों से बाहर निकाला जा
चुका है और वकील, पुलिस और अदालतें न्याय के नाम पर इन परिवारों के उत्पादन में
अपना हिस्सा मांग रहे हैं. जो पैसा बच्चों के शिक्षण और चारित्रिक विकास पर खर्च
हो सकता था, वह पैसा नये नये कानूनों के द्वारा समाज को और ज्यादा गुलाम बनाने पर
खर्च हो रहा है.
एक निरपेक्ष दृष्टा के नाते मेरा सदा यह मानना रहा है कि जब तक पुरुष के
माध्यम से महिलायें और महिलाओं के गर्भ से पुरुष जन्म लेते रहेगा, वे एक दूजे के
दुश्मन कैसे हो सकते है? किंतु दुर्भाग्य की बात यही है कि आज हमने एक ही ईश्वर के
बनाये एक दूसरे के लिए पूरक दो सृजनात्मक अविष्कारों को प्रतिद्वंदी के रूप में एक
दूसरे के सामने खड़ा कर दिया है. इस अर्थ में मनुष्यता मानो पहली बार अपने अस्तित्व
का सबसे बड़ा सकंट झेल रही है. काश: अपनी तरुणाई का बड़ा हिस्सा पाश्चात्य विश्व में
जीने वाले शरद जोशी को जो सृजनात्मक महिला भारत में दिखाई दी, वही हमारे तमाम समाजवादी,
स्त्रीवादी और वामपंथी कार्यकर्ताओं को दिखाई दे जाती तो शायद आज हम ज्यादा
गरिमामय और स्वाधीन जिंदगी के पथ पर अग्रगामी होते. न्याय की भीख माँगते पुलिसथानो
और अदालतों के भ्रष्ट गलियारों में नहीं भटकते.
अपने ऐसे ही लाजवाब विचारों से मेरी पीढ़ी को समृद्ध करनेवाले इस ज्ञान
योगी के सामने अपने अंतर्मन की गहराइयों से झुकने को जी चाहता है. ज्ञान-योगी कर्म
की यह यात्रा शतायु हो, यही उस महान ईश्वर से प्रार्थना है..
दिनेश
शर्मा

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