Saturday, June 13, 2015

क्या प्रतिभा केवल वामपंथीयों की बपौती है?



क्या प्रतिभा केवल वामपंथीयों की बपौती है?

पूना के राष्ट्रीय फिल्म और टीवी संस्थान पर टीवी के प्रसिद्ध कलाकार गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति पर संस्थान के वामपंथी झुकाव वाले विद्यार्थी इस तर्क से आपत्ति जता रहे हैं कि गजेंद्र चौहान की नियुक्ति मोदी सरकार का इस राष्ट्रीय संस्थान के कामकाज में हस्तक्षेप है और उनकी अकादमीक पात्रता महेश भट्ट, श्याम बेनेगल, अडूर गोपालकृष्णन और गिरीश कर्नाड जैसों की तुलना में कहीं नहीं ठहरती. वास्तव में महेश भट्ट की प्रत्येक फिल्म अपराधियों के उदात्तीकरण और कामुक कुंठा की अभिव्यक्ति के सिवा कौन सा संदेश देती है? क्या उनकी फिल्म इस देश के लाखों आम लोगों के जीवन संघर्ष का कहीं दीदार कराती है? क्या इस देश के दस हजार साल के गौरवशाली पन्नों का कहीं उनमें जिक्र होता है? किंतु इन वामपंथी विद्यार्थियों की नजर में वे प्रतिभाशाली है, गजेंद्र चौहान नहीं.

गजेंद्र चौहान का अपराध सिर्फ इतना है कि वे ९० के दशक के प्रसिद्द पौराणिक सीरियल “महाभारत” में युधिष्टर की भूमिका में काम कर चुके है और भाजपा के कुछ करीब है. किंतु क्या महेश भट्ट भी देश में गाँधी परिवार के करीबी नहीं थे? देश के अनेकानेक महत्व के संस्थानों पर वामपंथी झुकाव वाले लोगों को बिना किसी उपलब्धि या पात्रता के बनाये रखना और राष्ट्रवादी झुकाव वाले लोगों को कम अक्ल वाला बता कर उनकी नियुक्ति का विरोध करना, हमारी किस सोच का दर्शन कराता है?

जो वामपंथ का विचार उसके अपने जन्मस्थान रशिया और चीन से बेदखल किया जा चुका है, जिस वामपंथ पर दुनिया में स्वतंत्र विचार करने की आजादी को ही तबाह कर देने के आरोप लग चुके है, जिसके हाथ और पाँव अपने ही देशों के करोड़ों नागरिकों के खून से सने हुए है, जो आज भी नक्सलवाद के रूप में हमारी सरकारों को नासूर की तरह चुभते रहता है, आपको भारत में आज भी उस विचार की जयजयकार करनेवाले मूढ़ हर कहीं मील जाएंगें. खुद लाखों के वेतन वाली नौकरी पर कब्जा जमाए रखकर कोई सृजन नहीं करना और दूसरों की सृजनात्मकता को औसत और कमतर बता कर उस पर बहस तक से मुकरना, हमारे देश के वामपंथी विचारकों का दोधारी हथियार रहा है.

दुनिया का इतिहास गवाह है कि जहाँ जहाँ वामपंथ गया, वहाँ मानवीय स्वतंत्रता, मौलिकता और सृजनात्मकता ने अपनी अंतिम साँसें गिनी है. जीवन बुनियादी जरूरतों के आसपास ही केंद्रित रहा है, स्त्री पुरुष सबंध पशुओं से भी बदतर हाल में तब्दील कर दिए गए और समाजों की हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरायें पूरी तरह नष्ट भ्रष्ट कर दी गयी है. धर्म के मंदिर तोड़ कर उन्होंने अपने ही नेताओं के उनसे भी विशाल मंदिर बनवाए और उनकी पूजा अनिवार्य कर दी गयी. क्या किसी भी वामपंथी फिल्मकार ने इस तबाही पर कोई फिल्म कभी दुनिया को दिखाई है?

अपना एजेंडा लागु करने का वामपंथियों का एक आजमाया हुआ नुस्खा है. अपनी फिल्मों और आंदोलनों के माध्यम से परिवारों और समाजों को कमजोर करना और सरकारी संस्थाओँ को मजबूत करना. बाद में भले ही वे संस्थांए अपने भ्रष्ट आचरण से नागरिकों का जीना हराम कर दें, किंतु इससे वामपंथ मजबूत होता है, क्योंकि उसके सदस्य बढ़ते हैं. परिवार और समाज जितना संघठित होगा, वामपंथ उतना कमजोर होगा और समाज जितना कमजोर और सरकार जितनी मजबूत होती है, वामपंथ उतना शक्तिशाली और त्रासदायक हो जाता है. देश के किसी भी वामपन्थी संघठन ने आज तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया है क्योंकि सरकार के कर्मचारी तो इनकी मुख्य ताकत है.

आज देश के लगभग समस्त विश्वविद्यालयों में आपको सर्वोच्च पदों पर वामपंथी हावी मिलेंगें. क्या कोई उनसे पूछ सकता है कि क्यों आज हमारा कोई भी शैक्षणिक संस्थान विश्व के पहले पांच सौ संस्थानों में भी शामिल नहीं किया जाता? दशकों पुराने पाठ्यक्रम आज भी देश के युवाओं को पढ़ाकर उनकी जिंदगी से हर रोज खिलवाड़ किया जा रहा हैं, हर वर्ष देश के विश्वविद्यालय आस्ट्रेलिया की आबादी जितने बेरोजगारों की सौगात भारत को देते चले आ रहे हैं. किंतु उनके चलानेवालों को इससे कोई फर्क नहीं पढ़ता, उनके वेतन भत्ते चलते रहते हैं, बढ़ते रहते हैं.  

दुर्भाग्य से इस वामपंथी अधिनायकवाद के चलते हमारे देश में वास्तविक अर्थो में दक्षिणपंथी या राष्ट्रवादी विचार का जन्म ही नहीं हुआ है. हमारी प्रेरणाएँ आज भी विदेशों की ओर ताकती है. हमारा मिडिया हो या समस्त शैक्षणिक संस्थान, वहाँ की बहस में राष्ट्रवाद कट्टर लोगों की मानसिकता माना जाता है, धार्मिकता पिछड़े लोगों की जीवन शैली माना जाता है और कथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हर किस्म की औसत राजनीति को बर्दाश्त करना, उनकी दुनिया में आधुनिकता माना जाता है.

उनकी कथित धर्मनिरपेक्षता अल्पसंख्यकों से तो आग्रह करती है कि वे अपने धर्म और परंपराओं पर टिके  रहें और धर्म के नाम पर एकत्रित होकर मतदान करें किंतु बहुसंख्यक समाज से उनकी अपेक्षा है कि वह अपने धर्म और पहचान का कहीं दावा ना करें और उन्हें समाप्त हो जाने दें. हमारा मिडिया राष्ट्रवादी या दक्षिणपन्थी विचारों के प्रतिनिधि के रूप में किसी बेवकूफ बाबा, महाराज  या साध्वी को सामने ले आता है. उनके मूर्खतापूर्ण बड़बोले बयानों को समाचारों में तब्दील किया जाता है और हफ्तों उस पर बहस का पाखंड रचा जाता है. किंतु किसी भी वामपंथी असर वाले संस्थान के कामकाज या उनके खर्चो पर आपको कोई बहस या समाचार सुनने को नहीं मिलता.  देश को असली खतरा इन बाबाओं या साध्वियों से ना होकर देश का करोड़ों रुपया हर साल निगलने वाले इनके कामचोर संस्थानों से हैं.

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सृजनात्मकता से हीन दीन औसत विचारों वाले झोलाछाप बड़बोले कार्यकर्ता आपको देश को बहकाते मिल जाएंगें, सख्त से सख्त कानून बना कर देश की जनता को पुलिस, वकील और अदालतों के हवाले कर देने की जिरह करते मिल जायेंगे. किंतु देश के किसी भी प्रसार माध्यम में कोई भी वक्ता इन संस्थानों के वामपंथी नेतृत्व पर ऊँगली नहीं उठाता, उनकी रईस जीवन शैली और सादगी पर भाषणों के विरोधाभास पर कोई शक नहीं करता क्योंकि देश में वे बुद्धिमान और प्रतिभाशाली माने जाते है, या मिडिया के माध्यम से ऐसा वातावरण बन दिया जाता है कि लोग इन्हें प्रतिभाशाली माने.   

आज नेहरु की गलतियों की सजा देश भुगत रहा है. गांधीवाद की सादगी और कम खर्च वाली जीवन शैली को हमारे सामाजिक जीवन और सरोकारों से धकियाया जा चुका है, हमारी धार्मिक जीवन शैली को पिछड़ापन माना जा चुका है और देश के भविष्य को निर्माण करनेवाले संस्थान दूसरों की मेहनत को चूसने वाले कथित विचारको के हवाले सौंपे जा चुके है. देश और उसके राष्ट्रीय संस्थानों को यदि कहीं कोई भी खतरा है तो वह इन वामपंथी विचारकों से हैं ना कि देश की प्राचीनतम जीवन शैली को मानने वालों से.  

काश! ये नासमझ विद्यार्थी जितनी जल्दी इस सत्य को समझ लेंगें उतना इस देश को उनकी प्रतिभा से फायदा होगा.

दिनेश शर्मा

Wednesday, June 10, 2015

शक्ति की आराधना या कमजोर के प्रति करुणा?

शक्ति की आराधना या कमजोर के प्रति करुणा?

दिल्ली के भूतपूर्व कानून मंत्री श्री सोमनाथ भारती की पत्नी ने घरेलु हिंसा की शिकायत करते हुए दिल्ली राज्य महिला आयोग का दरवाजा खटखटाया और आयोग ने त्वरित भारती के विरुद्ध “हाजिर रहो” का एक नोटिस जारी कर दिया. देश के बाकी राज्यों में जो कार्य जिल्हा पुलिस अधीक्षक कार्यालय के बगल के दफ्तर में बैठी कोई महिला सामाजिक कार्यकर्ता बिना किसी शोरगुल के आसानी से कर लिया करती है, उसी काम को अंजाम देने के लिए दिल्ली में एक आयोग है जो जनता द्वारा संचित करों की रकम से करोड़ों रुपये खर्च करके वही काम बेहद अपमानजनक अंदाज में किया करता है. क्या भारती की पत्नी अपने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय पति के विरुद्ध ज्यादा गरिमापूर्ण ढंग से पेश नहीं आ सकती थी? क्या वह अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों की सहायता से मिडिया के अपमानजनक प्रकाश से परे इस मामले का निपटारा नहीं कर सकती थी?

सुबह ऐसा ही एक मामला चंद्रपुर, महाराष्ट्र की एक स्वास्थ्य-सेविका के साथ उसके उच्च अधिकारी द्वारा किये गए कथित जातीय दुर्व्यवहार का सामना आया.  एक टीवी चैनल पर वह स्वास्थ्य सेविका और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता मांग कर रहे थे कि उस उच्च-अधिकारी को तुरंत उसके उच्च पद से बर्खास्त किया जाये और उसकी डाक्टरी का पंजीयन भी सदा के लिए रद्द कर दिया जाये.  

हमारे ही वर्धा जिले के एक जिला-परिषद विद्यालय में अपने काम में लापरवाह मुख्याध्यापक की शिकायत जब गांव वालों ने उच्च अधिकारियों से की तो उस महाशय ने भी उनके विरुद्ध जातिवाचक गालीगलौच का आरोप लगाकर पुलिस में शिकायत कर दी. पुलिस की जाँच में जब सहयोगी शिक्षकों ने उनका समर्थन नहीं किया तो उन्होंने अपने सहयोगियों के विरुद्ध भी विभागीय स्तर पर जातीय पक्षपात की शिकायत कर दी. पूरी जाँच के पश्चात मुख्याध्यापक को निलंबित कर दिया गया क्योंकि उनकी शिकायत का कोई सिर पैर किसी जाँच एजेंसी को नहीं मिला जबकि उनके अपने काम में लापरवाही के सबूत कदम कदम पर बिखरे पड़े थे.

ऐसी तमाम शिकायतों में आम तौर पर साक्ष्य अधिनियम के अनुरूप सबूत तो होते ही नहीं है बल्कि कई बार तो अपने आपको निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी भी आरोपी पर ही होती है. शिकायतकर्ता अपनी शिकायत में उसे फंसा कर लुप्त हो जाता है और आरोपी जिंदगी भर इस आरोप से मुक्ति के लिए छटपटाता रहता है. सबसे बड़ी बात, इन आरोपों के पूरी तरह निराधार साबित होने के बावजूद आप शिकायतकर्ता का बाल भी बांका नहीं कर सकते क्योंकि सत्ता की पाशविक शक्ति उसके पक्ष में हैं, सत्य के पक्ष में नहीं.

हिन्दुस्थान में पिछले दो दशकों में गैर सरकारी संघठनों के दबाव में बने कई महिला और दलित हितैषी कानून आज उच्च अधिकार पद पर बैठे व्यक्तियों के लिए इस हद तक यातनादायी बन चुके है कि लोग जीवन भर कनिष्ट पद पर काम करने का विकल्प स्वीकार करके भी वरिष्ठता से बचने की कोशिश करते है. विवाह विषयक मामलों में एक दूसरे के क़ानूनी आतंक से बचने के लिए शहरों में लोगों ने लिव-इन-रिलेशनशिप का विकल्प चुना था. आज वे मुक्त संबन्ध भी क़ानूनी दायरे में हैं.

अभी जुम्मा जुम्मा दो दशकों पूर्व तक हमारे यहाँ शक्ति की आराधना का दौर था. लोग अपनी कमजोरी छिपा कर, अपने घर को रेशमी पर्दों में ढंक कर अपनी मूछों पर ताव दिया करते थे. आम तौर पर भले ही गरीबी जीवन का सामान्य सत्य थी, लोग शादी विवाह के मामले में अपनी रईसी की शेखी बघारते थे. क्योंकि जिनके पास कुछ नहीं था, उनके पास प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान ही जीने का सबसे बड़ा आधार था. अपने स्कूली दिनों में हम सभी मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी पढ़ चुके है, जहाँ पठान साहूकार द्वारा एक कथित रईस के घर का परदा खींचते ही हाहाकार मच जाता है क्योंकि भीतर महिलाओं के शरीर पर ढंग के कपड़े भी नहीं होते हैं.    

यह वह दौर था जब हर हाल में रिश्तों को बनाये रखने पर जोर था, मध्यस्थ का सम्मान था और सरकार, वकील, पुलिस और न्यायाधीश एक दूसरी दुनिया का विषय थे. ऑफिस में बड़े साहब की नजरे इनायत हमारे लिए खुशी का सबब होती क्योंकि उसका सीधा सम्बन्ध हमारे रोजमर्रा के सम्मान से था. आज हम एक नयी आधुनिक दुनिया की खोज में क़ानूनी टाइम बम डालकर मानो उस पुरानी दुनिया को ध्वस्त कर चुके है.

शक्ति की आराधना के दौर से निकलकर हम कमजोरों के प्रति अतिशयोक्तिपूर्ण करुणा के दौर में प्रविष्ट हो चुके है. जिस समाज में कमजोर होना, औसत होना और विकलांग होना सुरक्षित तथा शक्तिशाली होना, स्वस्थ होना, और असामान्य प्रतिभाशाली होना खतरनाक माना जायेगा, वहाँ कौन शक्ति की आराधना करेगा? कौन उच्च आदर्शो के लिए मरने मिटने को तत्पर होगा? जहाँ रिश्तों से ज्यादा महत्व सरकारी हस्तक्षेप का हो, जहाँ घर के किसी मध्यस्थ या बुजुर्ग से ज्यादा महत्व किसी भ्रष्ट पुलिसकर्मी, फ़ीस को लालायित वकील या पगारी न्यायाधीश का हो, उस घर में इसके उसके सही या गलत होने के तर्क भले पनप जाये, सामूहिक सृजन की फसलें नहीं लहलहा सकती.
ठीक वैसे ही जिस समाज में व्यक्ति की प्रतिभा और कौशल्य से ज्यादा महत्व उसके जन्म के प्रमाण पत्र को दिया जाता हो, जहाँ किसी की आजादी दूसरे की सनक और मनमानी के अधीन हो, वहाँ सरकार जनता के करों से जमा पैसा भले समाजसेवा के नाम पर लुटा लें, उसका भला नहीं कर सकती है. ऐसे निजाम में सरकार ही सामाजिक एकता के नाम पर  समाज को खण्ड खंड में तोड़ देती है.  

हमारे यहाँ पशुओं के प्रति करुणा धार्मिक जीवन मूल्य रहा है, किंतु इसी मूल्य को जब आप सत्ता की पाशविक शक्ति से लागु करते है तब वहाँ इंसान से ज्यादा शक्तिशाली पशु हो जाते है. फिर पशुओं के कंधों पर बंदूक रखकर इंसानों का शिकार किया जाता है. जिस देश में पिछले दो दशकों में लाखों की तादाद में किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर करनेवाला एक भी दोषी हम आज तक खोज नहीं पाए, उसी देश में उनके पशुओं को इधर से उधर ले जाते हजारों इंसान रोज पकड़े जाते है, लूटे जाते है और हमारी क्रूर न्यायिक सिस्टम के शिकार बनाये जाते है.    

जिस अंदाज में हम औसतपन, कमजोरी और पशुता को मुख्य धारा का सर्वोच्च आसन देते हुए वरिष्ठता, योग्यता और इंसानियत को धकियाकर कटघरे में खड़ा कर रहें हैं वह दिन दूर नहीं जब हमारे ये आदर्श ही हमें अधमता और पशुता की ओर खींच ले जायेंगे.

देखने की बात यह होगी कि उस समय के मानव अधिकार समूह किस बात की वकालत करेंगें? नैतिक मूल्यों के सर्वांगीण पतन के उस बिंदु पर किसी उच्च आदर्श की ओर उठने का आव्हान करेंगें या पहले से भी ज्यादा अधमता की यात्रा का आगाज करेंगें?

दिनेश शर्मा

Tuesday, June 9, 2015

अरविन्द केजरीवाल और तोमर: कर्म का दिवालियापन



अरविन्द केजरीवाल और तोमर: कर्म का दिवालियापन

जितेन्द्रसिंह तोमर की सायंस स्नातक और वकालत की डिग्री की सत्यता या उसके जाली होने को लेकर देश के समाचार माध्यमों में बहस का जो स्तर दिखा उससे डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत उल्टा चलता दिखाई देता है. हम वनमानुष से इंसान बनने के बजाये इंसान से वनमानुष होने की यात्रा पर बढ़ते ज्यादा दिखाई दे रहे है. विज्ञान और प्रोदोयोगिकी के इस जमाने में किसी व्यक्ति की शैक्षणिक पात्रता का पता लगाने में कितना वक्त लगना चाहिए? ईमेल और संचार क्रांति के इस जमाने में महज बीस वर्ष पुरानी किसी डिग्री की सत्यता का पता ज्यादा से ज्यादा चौबीस या बहुत हुआ तो ७२ घंटों का मामला है. यदि अरविन्द केजरीवाल और जितेन्द्रसिंह तोमर अपनी बात पर दृढ़ रहना चाहते थे तो उन्हें केवल इतना करना था कि तोमर की असली डिग्रीयां अपनी पार्टी की वेबसाइट पर डाल देते और फिर लोगों को चुनौती देते कि आओ, हिम्मत है तो उन्हें झूठा साबित करके दिखाओ. 
किंतु दुर्भाग्य से दोनों ने अपनी पार्टी के पारदर्शकता के आसमानी दावों के बावजूद आज तक ऐसा नहीं किया. वे चाहते तो पिछले चार महीनों में आसानी से देश को बता सकते थे कि तोमर  कब, किस विश्वविद्यालय में पढ़े है, कब पास या फेल हुए, कब उन्होंने अपना विश्वविद्यालय बदला और कब वे वकील के रूप में अपनी वकालत शुरू करने के पात्र हुए थे. लेकिन दोनों ही महाशय अपनी ओर से सच्चाई छिपाते रहें और हमारे अन्य भ्रष्ट नेताओं की तरह यही बहाना बनाते रहें कि मामला उच्च न्यायालय में प्रलंबित है और उसका फैसला आने वाला है. उधर जिस व्यक्ति ने यह मामला उच्च न्यायालय में दाखिल किया था, उसके साथ मिलकर वे इस मामले को कमजोर भी करते रहें. 

अब पूरी आम आदमी पार्टी चिल्ला रही है:

  •         कि तोमर कोई आतंकवादी तो नहीं है कि उन्हें इतनी रफ्तार से पकड़ना जरुरी था,
  •         कि देश में लोकतंत्र खतरे में है, आपातकाल आ रहा हैं, और  
  •         कि कई अन्य नेताओं (उदा. स्मृति ईरानी, बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण महाराज) आदि की भी डिग्रियां फर्जी है.

मेरी अपनी वकालत की समझ से इन प्रश्नों के उत्तर निम्न है:-

इसमें कोई शक नहीं है की तोमर आतंकवादी नहीं है किंतु क्या किसी वकील और नेता को जालसाजी के बल पर लोगों को मूर्ख बनाने की केवल इस आधार पर छूट दी जा सकती है कि वह कहीं भाग कर तो नहीं जा रहा है? किसी नेता पर कोई कार्यवाही जल्दबाजी में हुयी या देरी से, इसका पैमाना क्या होना चाहिए? यहाँ तो मामला चार महीनों से जनचर्चा का विषय है, एक माह पूर्व इसमें पोलिस शिकायत दर्ज हो चुकी है, संबंधित विश्वविद्यालय तोमर की दोनों डिग्रियां जाली होने की घोषणा कर चुके है. ये दोनों विश्वविद्यालय  गैरभाजपा शासित राज्यों में है. एक में तो केजरीवाल के मित्र नितीश कुमार की सत्ता है. फिर इस मामले में वे और कितनी देरी चाहते है? रहा सवाल उच्च न्यायालय में मामले के प्रलंबित होने का, तो इससे भी कहीं पुलिस के अपराधिक मामले में जाँच के अधिकार कम नहीं होते. यदि तोमर चाहते तो अभी तक उच्च न्यायालय में अपनी असली डिग्रियाँ बता कर मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कर सकते थे. किंतु वे तो वहाँ भी मामले को रफादफा करवाना चाहते थे. इसलिए आज इन दोनों नेताओं का यह प्रलाप केवल दूसरों को मूर्ख समझने का पागलपन है.

रहा सवाल आपातकाल का, तो इस पर मेरा प्रश्न यह है कि क्या किसी जालसाज के अपने पद पर बने रहने देने से देश में लोकतंत्र चिरस्थाई हो जाता? अरविंद केजरीवाल का यह तर्क तो ऐसा है मानो जो व्यवस्था उनसे कुछ भी जायज प्रश्न पूछेगी, वह तानाशाही वाली व्यवस्था होगी. वास्तव में न्यायालय, पुलिस, विधानसभा, पार्टी, विरोधी दल और पार्टी के असंतुष्ट तो होते ही इसलिए है कि हम इन सभी के दबाव में अपनी सीमाओं में चलना सीखें. जहाँ ये नहीं होते है, वहाँ तानाशाही निश्चित रूप से आती है, जोकि उन्होंने अपनी ही पार्टी में लागु करके रखी है.

आज उनकी बेशर्म मूर्खता पर वहाँ ऊँगली उठाने लायक भी कोई बचा नहीं है. आशुतोष और संजय सिंह जैसे किसी ज़माने के तर्कशील वक्ता अपने आप में बेहद हास्यास्पद लगने लगे है और बात बात में चिड़कर अपनी बात रखते है. उनका तर्क बच्चों के समान बेहद सरल होता है, “क्लास में मस्ती मैंने अकेले ने नहीं की, बाकी ने भी की है, उन्हें भी साथ साथ सजा दो.” यह तो ऐसे हुआ मानो रात में आपके घर में कोई चोर पकड़ा जाता है, आप पकड़कर उसे पुलिस के हवाले करते है, और वह पुलिस से मुंहजोरी करने लगे कि पहले गांव के बाकी चोर पकड़ो, फिर मुझे हाथ लगाना. पुलिस नहीं मानती है तो देश में आपातकाल आ गया है और मान जाती है तो देश में लोकतंत्र कायम है. दुर्भाग्य से यह घटिया तर्क उस पार्टी की ओर से आ रहा है जिस पर इस देश ने अपनी सबसे ज्यादा आशायें लगा रखी थी.  

अब रहा सवाल देश के बाकी के नेताओं की डिग्रियों का. इस बात की बारीकी को समझने के लिए पहले तो हमें यह पता होना चाहिए कि देश में किसी भी राजनैतिक पद पर पहुंचने की कोई भी शैक्षणिक अर्हता हमारे संविधान ने तय नहीं की है. कोई अनपढ़ आदमी भी देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकता है. आपको वकालत करने के लिए कानून की डिग्री अनिवार्य है, कानून मंत्री बनने के लिए नहीं. आपको लोगों की चिकित्सा करने के लिए डॉक्टर की डिग्री आवश्यक है, स्वास्थ्य मंत्री बनने के लिए नहीं. आपको एक दुचाकी वाहन भी चलाना हो तो परिवहन विभाग का असली लायसेंस आवश्यक है, किंतु देश का परिवहन मंत्री बनने के लिए इसकी कतई जरूरत नहीं है. वहाँ पहुँचने के लिए एकमात्र योग्यता है कि आप लोगों के प्रतिनिधि के रूप में चुनाव में चुन कर आये. यह लोगों का अधिकार है कि वे आपको जाने, समझे और स्वीकार करें या ठुकरा दें. इसलिए किसी अन्य नेता की शैक्षणिक पात्रता की तुलना एक वकील से कैसे हो सकती है, जो अपनी जाली डिग्री के बल पर आज तक अपने पक्षकारों और देश की अदालतों की आँखों में धूल झोंक रहा था? बस इसी कारण से तोमर कानून के सामने अपराधी है और बाकी के लोग महज शेखी बघारने के दोषी.  

दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार चला रही है कि सर्कस, यही समझ से परे है. संचित कर्मो का दिवालियापन कभी कभी तकदीर से मिले किसी महान अवसर को किस तरह बर्बाद करता है, अरविंद केजरीवाल, आने वाले दौर में उसकी एक मिसाल के रूप में अवश्य याद किये जायेंगे.  

दिनेश शर्मा

गाँधी नाम की दुकान

इस देश में गाँधी नाम के प्रमाणपत्र बाँटने का ठेका केवल गिने चुने खानदानों या उनके लाभार्थियों ने लेकर रखा है. इन लोगों को लेफ्ट से कोई समस्य...