शक्ति की आराधना या कमजोर के प्रति करुणा?
दिल्ली के भूतपूर्व कानून मंत्री श्री सोमनाथ भारती की पत्नी ने
घरेलु हिंसा की शिकायत करते हुए दिल्ली राज्य महिला आयोग का दरवाजा खटखटाया और आयोग
ने त्वरित भारती के विरुद्ध “हाजिर रहो” का एक नोटिस जारी कर दिया. देश के बाकी
राज्यों में जो कार्य जिल्हा पुलिस अधीक्षक कार्यालय के बगल के दफ्तर में बैठी कोई
महिला सामाजिक कार्यकर्ता बिना किसी शोरगुल के आसानी से कर लिया करती है, उसी काम
को अंजाम देने के लिए दिल्ली में एक आयोग है जो जनता द्वारा संचित करों की रकम से करोड़ों
रुपये खर्च करके वही काम बेहद अपमानजनक अंदाज में किया करता है. क्या भारती की
पत्नी अपने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय पति के विरुद्ध ज्यादा गरिमापूर्ण ढंग से
पेश नहीं आ सकती थी? क्या वह अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों की सहायता से
मिडिया के अपमानजनक प्रकाश से परे इस मामले का निपटारा नहीं कर सकती थी?
सुबह ऐसा ही एक मामला चंद्रपुर, महाराष्ट्र की एक स्वास्थ्य-सेविका
के साथ उसके उच्च अधिकारी द्वारा किये गए कथित जातीय दुर्व्यवहार का सामना आया. एक टीवी चैनल पर वह स्वास्थ्य सेविका और कुछ
सामाजिक कार्यकर्ता मांग कर रहे थे कि उस उच्च-अधिकारी को तुरंत उसके उच्च पद से
बर्खास्त किया जाये और उसकी डाक्टरी का पंजीयन भी सदा के लिए रद्द कर दिया जाये.
हमारे ही वर्धा जिले के एक जिला-परिषद विद्यालय में अपने काम
में लापरवाह मुख्याध्यापक की शिकायत जब गांव वालों ने उच्च अधिकारियों से की तो उस
महाशय ने भी उनके विरुद्ध जातिवाचक गालीगलौच का आरोप लगाकर पुलिस में शिकायत कर
दी. पुलिस की जाँच में जब सहयोगी शिक्षकों ने उनका समर्थन नहीं किया तो उन्होंने
अपने सहयोगियों के विरुद्ध भी विभागीय स्तर पर जातीय पक्षपात की शिकायत कर दी. पूरी
जाँच के पश्चात मुख्याध्यापक को निलंबित कर दिया गया क्योंकि उनकी शिकायत का कोई
सिर पैर किसी जाँच एजेंसी को नहीं मिला जबकि उनके अपने काम में लापरवाही के सबूत कदम
कदम पर बिखरे पड़े थे.
ऐसी तमाम शिकायतों में आम तौर पर साक्ष्य अधिनियम के अनुरूप
सबूत तो होते ही नहीं है बल्कि कई बार तो अपने आपको निर्दोष साबित करने की
जिम्मेदारी भी आरोपी पर ही होती है. शिकायतकर्ता अपनी शिकायत में उसे फंसा कर
लुप्त हो जाता है और आरोपी जिंदगी भर इस आरोप से मुक्ति के लिए छटपटाता रहता है.
सबसे बड़ी बात, इन आरोपों के पूरी तरह निराधार साबित होने के बावजूद आप शिकायतकर्ता
का बाल भी बांका नहीं कर सकते क्योंकि सत्ता की पाशविक शक्ति उसके पक्ष में हैं,
सत्य के पक्ष में नहीं.
हिन्दुस्थान में पिछले दो दशकों में गैर सरकारी संघठनों के दबाव
में बने कई महिला और दलित हितैषी कानून आज उच्च अधिकार पद पर बैठे व्यक्तियों के
लिए इस हद तक यातनादायी बन चुके है कि लोग जीवन भर कनिष्ट पद पर काम करने का
विकल्प स्वीकार करके भी वरिष्ठता से बचने की कोशिश करते है. विवाह विषयक मामलों
में एक दूसरे के क़ानूनी आतंक से बचने के लिए शहरों में लोगों ने लिव-इन-रिलेशनशिप
का विकल्प चुना था. आज वे मुक्त संबन्ध भी क़ानूनी दायरे में हैं.
अभी जुम्मा जुम्मा दो दशकों पूर्व तक हमारे यहाँ शक्ति की
आराधना का दौर था. लोग अपनी कमजोरी छिपा कर, अपने घर को रेशमी पर्दों में ढंक कर
अपनी मूछों पर ताव दिया करते थे. आम तौर पर भले ही गरीबी जीवन का सामान्य सत्य थी,
लोग शादी विवाह के मामले में अपनी रईसी की शेखी बघारते थे. क्योंकि जिनके पास कुछ
नहीं था, उनके पास प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान ही जीने का सबसे बड़ा आधार था. अपने
स्कूली दिनों में हम सभी मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी पढ़ चुके है, जहाँ पठान
साहूकार द्वारा एक कथित रईस के घर का परदा खींचते ही हाहाकार मच जाता है क्योंकि
भीतर महिलाओं के शरीर पर ढंग के कपड़े भी नहीं होते हैं.
यह वह दौर था जब हर हाल में रिश्तों को बनाये रखने पर जोर था,
मध्यस्थ का सम्मान था और सरकार, वकील, पुलिस और न्यायाधीश एक दूसरी दुनिया का विषय
थे. ऑफिस में बड़े साहब की नजरे इनायत हमारे लिए खुशी का सबब होती क्योंकि उसका
सीधा सम्बन्ध हमारे रोजमर्रा के सम्मान से था. आज हम एक नयी आधुनिक दुनिया की खोज
में क़ानूनी टाइम बम डालकर मानो उस पुरानी दुनिया को ध्वस्त कर चुके है.
शक्ति की आराधना के दौर से निकलकर हम कमजोरों के प्रति
अतिशयोक्तिपूर्ण करुणा के दौर में प्रविष्ट हो चुके है. जिस समाज में कमजोर होना,
औसत होना और विकलांग होना सुरक्षित तथा शक्तिशाली होना, स्वस्थ होना, और असामान्य
प्रतिभाशाली होना खतरनाक माना जायेगा, वहाँ कौन शक्ति की आराधना करेगा? कौन उच्च
आदर्शो के लिए मरने मिटने को तत्पर होगा? जहाँ रिश्तों से ज्यादा महत्व सरकारी
हस्तक्षेप का हो, जहाँ घर के किसी मध्यस्थ या बुजुर्ग से ज्यादा महत्व किसी भ्रष्ट
पुलिसकर्मी, फ़ीस को लालायित वकील या पगारी न्यायाधीश का हो, उस घर में इसके उसके सही
या गलत होने के तर्क भले पनप जाये, सामूहिक सृजन की फसलें नहीं लहलहा सकती.
ठीक वैसे ही जिस समाज में व्यक्ति की प्रतिभा और कौशल्य से
ज्यादा महत्व उसके जन्म के प्रमाण पत्र को दिया जाता हो, जहाँ किसी की आजादी दूसरे
की सनक और मनमानी के अधीन हो, वहाँ सरकार जनता के करों से जमा पैसा भले समाजसेवा
के नाम पर लुटा लें, उसका भला नहीं कर सकती है. ऐसे निजाम में सरकार ही सामाजिक
एकता के नाम पर समाज को खण्ड खंड में तोड़ देती
है.
हमारे यहाँ पशुओं के प्रति करुणा धार्मिक जीवन मूल्य रहा है,
किंतु इसी मूल्य को जब आप सत्ता की पाशविक शक्ति से लागु करते है तब वहाँ इंसान से
ज्यादा शक्तिशाली पशु हो जाते है. फिर पशुओं के कंधों पर बंदूक रखकर इंसानों का
शिकार किया जाता है. जिस देश में पिछले दो दशकों में लाखों की तादाद में किसानों
को आत्महत्या के लिए मजबूर करनेवाला एक भी दोषी हम आज तक खोज नहीं पाए, उसी देश
में उनके पशुओं को इधर से उधर ले जाते हजारों इंसान रोज पकड़े जाते है, लूटे जाते
है और हमारी क्रूर न्यायिक सिस्टम के शिकार बनाये जाते है.
जिस अंदाज में हम औसतपन, कमजोरी और पशुता को मुख्य धारा का
सर्वोच्च आसन देते हुए वरिष्ठता, योग्यता और इंसानियत को धकियाकर कटघरे में खड़ा कर
रहें हैं वह दिन दूर नहीं जब हमारे ये आदर्श ही हमें अधमता और पशुता की ओर खींच ले
जायेंगे.
देखने की बात यह होगी कि उस समय के मानव अधिकार समूह किस बात की
वकालत करेंगें? नैतिक मूल्यों के सर्वांगीण
पतन के उस बिंदु पर किसी उच्च आदर्श की ओर उठने का आव्हान करेंगें या पहले से भी
ज्यादा अधमता की यात्रा का आगाज करेंगें?
दिनेश शर्मा

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