जेनेटिक क्रांति: किसान विरोधी नीति की ओर मोदी सरकार
वैज्ञानिक अविष्कारों के क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप किस
हद तक समाज विरोधी हो सकता है, इसका एक विदारक उदाहरण मोदी सरकार की जेनेटिक बीज
संबंधी नीतियों को लेकर सामने आ रहा है. विश्व की जानी मानी जेनेटिक कंपनी,
मोनसेंटो को लेकर दिया गया कृषि राज्य
मंत्री का बयान ना केवल उनकी आत्महंता राजनीती का परिचय देता है, बल्कि इस देश के
किसानों के लिये आनेवाला भविष्य केवल संकटों से भरा होगा, इसकी ओर भी इशारा करता
है.
पिछले
बीस से ज्यादा वर्षों से संघ परिवार से जुड़े समस्त संघठन जेनेटिक बीजों के क्षेत्र
में समूची दुनिया में हुयी बेमिसाल क्रांति को नकारते रहे हैं. वे ऋषि खेती,
स्वदेशी खेती और ओर्गेनिक खेती के नाम पर बेहद असरहीन प्रयोग इधर उधर करते रहते
है, और किसान उनकी उछल कूद उपेक्षा से देखते रहते है. संघ परिवार, वामपंथियों और कथित
पर्यावरणवादियों के दबाव के चलते देश में पिछले एक दशक से जेनेटिक बीजों के जमीनी
परीक्षणों पर पूरी पाबंदी लगी हुयी है. देश के कृषि विश्वविद्यालयों की सैकड़ों
लेबोरेटरीज में कार्यरत युवा कृषि-वैज्ञानिक हताशा और निराशा के दलदल में डूबते जा
रहे हैं. देश का सकल कृषि उत्पादन गैर-जेनेटिक क्षेत्र में ना केवल थम गया है,
बल्कि नकारात्मक झुकाव दर्शा रहा है. छोटी जोत, मंहगी मजदूरी और महँगे कर्ज के
कारण हर उगते दिन के साथ खेती निःसंदिग्ध रूप से केवल और केवल घाटे का सौदा बनती
जा रही है. किसान सैकड़ों नहीं, हजारों की तादाद में आत्महत्या करके अपने गरिमाहीन दरिद्र
जीवन से मुक्ति का रास्ता तलाश रहे है. कृषि क्षेत्र में नयी पूंजी, नयी प्रतिभा
और नूतन प्रेरणा के निवेश की कोई संभावना कहीं दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रही है.
ऐसे
में एक आम विवेक और अर्थशास्त्र की समझदारी रखनेवाला व्यक्ति मोदी सरकार से क्या
उम्मीद रखता? यही कि उन्होंने सारी दुनिया से बेहतरीन से बेहतरीन बीज भारत के
किसानों को मुहैया कराकर उनकी कृषि को हरसंभव तरीके से लाभ का कारोबार बनाना
चाहिये और नए नए वैज्ञानिक प्रयासों को समर्थन देना चाहिये जिससे कि देश में कृषि
की प्रति व्यक्ति और प्रति हेक्टर उत्पादकता बढ़ें और उसका खर्च कम हो. कोई साधारण
मगज वाला व्यक्ति भी इससे सहमत होगा कि तकनीक से मानवीय श्रम की उत्पादकता बढ़ती है
और गरिमापूर्ण जीवन की संभावना पहले से ज्यादा सुरक्षित होती है. दुनिया में आज भी
वही देश और वही समाज विपन्न है जहाँ नयी तकनीक की पहुंच नहीं है और हर रोज पुरानी
आदिम अस्मिताओं के नारे लग रहे हैं. जहाँ आज
भी पुरानी ग्रामीण जीवन शैली सदियों से बिना किसी बदलाव के जारी है, वहाँ आदमी की
औसत उम्र विकसित देशों की तुलना में आधी है, महिलायें अपनी गुलामी में ही सुरक्षा
की तलाश करने को मजबूर है और दवा से ज्यादा पैसा समाज हथियारों पर खर्च कर रहे हैं.
उन तमाम देशों में आदमी की जिंदगी की कीमत किसी पालतू जानवर से किंचित भी ज्यादा
नहीं है.
सरकार
का कहना है कि मोनसेंटो ज्यादा फायदा कमा रही है, अतः उसकी रायल्टी कम करना
चाहिये. क्या उसके इस एकाधिकार को बढ़ावा देने में स्वयं स्वदेशी और वामपंथी लॉबी
का हाथ नहीं है? वे यदि तकनीक में निवेश को बढ़ाने का आंदोलन करते, जेनेटिक बीजों
के जमीनी परीक्षणों का विरोध नहीं करते और देश के विश्वविद्यालयों को अपना
वैज्ञनिक काम करने देते, तो मोनसेंटो की क्या मजाल थी कि वह ज्यादा रायल्टी माँगती.
अभी तक देश में ही उसके कितने ही प्रतिद्वंदी विकसित हो जाते और बाजार की ताकत
मोनसेंटो को अपनी कीमतें गिराने को मजबूर कर देती. किंतु केवल कथित पर्यावरणवादियों,
वामपंथियों और संघ परिवार के लोगों की मूर्खता के चलते देश में ऐसा नहीं हो सका.
आज मोनसेंटो के एकाधिकार के लिये यदि कोई दोषी है तो वे ही लोग है, जो स्वदेशी के
नाम पर हर विदेशी ज्ञान-विज्ञान का विरोध करते रहे हैं. आज संघ परिवार को जेनेटिक
बीजों से कोई शिकायत नहीं है बल्कि अब उसकी शिकायत है कि यह तकनीक महंगी क्यों
हैं? क्या संघ परिवार और वामपंथी आज तक के अपने इस विज्ञान विरोधी प्रचार के लिये
देश के नौजवान कृषि वैज्ञानिकों की खर्च हो चुकी उस पीढ़ी से माफ़ी मांगेगें जिनके
जमीनी प्रयोग केवल उनके पूर्वाग्रहों के चलते रोक दिए गए थे? क्या वे उन आत्महत्या
ग्रस्त किसान परिवारों से माफ़ी मांगेंगें, जिनके परिवारों को अपनी जरूरत की तकनीक का
प्रयोग करने की बुनियादी आजादी से भी उन्होंने वंचित करके रखा था? क्या किसी बीमार
को दवा देने में देरी करनेवाला सुधारक उसकी असामयिक मृत्यु का दोषी और अपराधी नहीं
माना जाना चाहिये?
जब
देश में किसी तकनीक के परीक्षण पर ही बंदी हो तो देशी तकनीक का भी विकास कैसे
होगा? आज दुर्भाग्य से देश में कहीं कोई देशी जेनेटिक तकनीक मौजूद नहीं है. हमारी
तमाम प्रयोगशालाएं लगभग बंद होने के कगार पर है. कृषि विज्ञान नाम की शाखा ही मानो
लुप्त होने के कगार पर है. मोनसेंटो का बीज बिकता है क्योंकि खेती करनेवाला मामूली
किसान किसी भी पढे लिखे नेता से ज्यादा अच्छी तरह जानता है कि उसके लिये क्या
बेहतर है. वह यदि कथित सुधारकों को जैसी चाहिये वैसी खेती नहीं कर रहा है तो इसका
सीधा सरल कारण यह है कि ऐसी खेती निबंध और भाषणों में तो चल सकती है किंतु उसके
खेत में वह लाभदायक नहीं है. किसी दूसरे तर्क के लिये यहाँ कोई जगह ही नहीं है.
आज
मोदी सरकार उसी किसान के उस शेष बचे अधिकार को भी कुचलने जा रही है. मोनसेंटो को
आप बाहर का रास्ता बता देंगे और आपकी देशी जेनेटिक तकनीक बाजार में मौजूद ही नहीं
है. जब तक आपकी वह तकनीक आयेगी, दुनिया विज्ञान के किसी और नए चरण तक पहुंच चुकी
होगी. संघ और वामपंथ फिर उस वैज्ञानिक अविष्कार का विरोध करेंगें और फिर एक दो
पीढ़ियां उनकी कूपमंडूकता में तबाह हो जायेगी. यही कुछ संघठनों ने १९८० के दशक में भारत
में रंगीन टीवी और कंप्यूटर के आगमन का विरोध करके किया था, इसी पिछड़ेपन का परिचय हमने
९० के दशक की आर्थिक पुनर्रचना का विरोध करके दिया था. किंतु दुर्भाग्य से देश
टीवी के बगैर तो रह सकता था, बीटी के बगैर अब उसके बचने की कोई संभावना नहीं है.
मोदी
जी! ऐसे में देश का कर्ज के बोझ से चरमरा रहा गरीब किसान क्या करें? क्या वह
पुरानी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपनी शेष बची कमर भी तुड़वा ले या खेती ही करना
बंद कर दें? क्या आपकी पार्टी के नेता विज्ञान को लेकर अपने अन्धविश्वासों से आजाद
नहीं हो सकते हैं? आपके ही एक मंत्री पियूष गोयल साहब ने एलएडी बल्ब को सारे भारत
में घर घर तक पहुंचा कर यह साबित कर दिया है कि विज्ञान के नए अविष्कारों का
पुरजोर समर्थन किसतरह सदियों का अँधेरा दूर कर सकता है. आपके दूसरे मंत्री मनोहर
परिकर हमारी सेना को सबसे आधुनिक हथियार सबसे सस्ती कीमत पर मुहैया कराने के लिये
दिन रात एक कर रहें हैं. क्या आपके कृषि मंत्री नयी तकनीक को लेकर उनसे कोई
प्रेरणा नहीं ले सकते है? यदि कोई तकनीक महंगी है तो उससे किसानों को सदा के लिये
वंचित करने से बेहतर क्या यह नहीं होता कि हम उसे ज्यादा मात्रा में खरीद कर उस
क्षेत्र में और भी खिलाड़ियों के प्रवेश को प्रोत्साहित करते? क्या सरकारी डंडे के
बजाये प्रतियोगी बाजार भारत के भविष्य के लिये ज्यादा उम्मीदों भरा नहीं होता?
मोदी
जी! आपके
पास सफल मंत्रियों की गाथा भी है तो असफल होने की संभावना भी.. फैसला आपको करना
है..
एड. दिनेश शर्मा
अध्यक्ष- स्वतंत्र भारत पार्टी, महाराष्ट्र
संपर्क:- ०९१३०३२७६६४

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