Monday, July 27, 2015

दक्षिण के राम- अब्दुल कलाम



दक्षिण के राम- अब्दुल कलाम

महान भारत की महान ज्ञान परंपरा के वर्तमान दौर के सबसे प्रखर नक्षत्र अब्दुल पाकिर जैनुलाब्दीन कलाम की जीवन यात्रा कल रात २७ जुलाई २०१५ को परदे के आड़ चली गयी. बिना किसी बुलावे के कुछ आँसू आँखों पर आकर ठहर गए और यूँ लगा जैसे दिल के मंदिर में बैठा एक गरिमामय अतीथि बिना किसी को बताये सुबह सबेरे अपनी आगामी यात्रा पर चला गया. आजादी के बाद जन्मे हर भारतीय के लिए कलाम का नाम सबसे गर्व से किया गया उच्चारण था. जाति, भाषा, धर्म  और तमाम छोटी बड़ी अस्मिताओं से बटें हम भारतीयों के हृदय सिंहासन पर इस एक व्यक्ति का शासन मानो सबसे सुरक्षित, सबसे अटल था.

राममनोहर लोहिया ने लिखा है कि त्रेता युग में उत्तर की अयोध्या का एक कुलदीपक राजकुमार राम अपनी दक्षिण विजय यात्रा पर निकला और उसकी इसी विजय यात्रा ने उत्तर और दक्षिण भारत को सदा के लिए एक कर दिया था और एक महान भारतीय सांस्कृतिक विश्व की शुरुआत की थी. इस एकता ने कुल-हीन, शील-हीन तमाम छोटे बड़े कबीलाई समूहों को एक महान सपना दिया और उनकी बिखरी-बिखरी अपने आप से ही संघर्षरत उर्जा एक समर्थ और समृद्ध भारत के निर्माण में काम आयी.  नतीजे में सभी को समाहित करने वाली एक महान सांस्कृतिक एकता का जन्म हुआ. अमेरिका में “स्टेचू ऑफ लिबर्टी” खड़ी होने के सदियों पहले इस देश ने अपनी इसी धरोहर के बल पर मानवीय मष्तिष्क में जन्मे हर विचार को अपने यहाँ स्थान दे दिया था. इसी के प्रशांत आश्वासन के चलते सारी दुनिया से ठुकराए गए बंदे भारत माता की गोद में आये और सदा के लिए यहाँ के होकर रह गए.

हमारी सदी में दक्षिण के रामेश्वरम में एक गरीब और सुसंस्कृत परिवार में जन्मे कलाम ने अपनी अखंड देशभक्ति, ऋषियों के समान सादगी, भारत की हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरा के पालन और देश की युवा शक्ति में अपने अटल विश्वास के चलते हर भारतीय के मन में ऐसे ही एक राष्ट्रीय स्वप्न को जन्म दे दिया है. वे एक महान वैज्ञानिक थे, किंतु उनके भीतर का कण कण सैकड़ों सदियों के विस्तार में फैली भारत की अनादि अनंत ज्ञान परंपरा से उपजा था, पश्चिम से नहीं. वे स्वयं अपने आपको “संपूर्ण रूप से मेड इन इंडिया’ बताने में गर्व महसूस करते थे.  वे हरेक अर्थ में हमारी हजारों वर्षों की ऋषि परंपरा की एक आधुनिक कड़ी थे. भारत को सपेरों और धूल सने साधुओं का पिछड़ा हुआ देश मानने वाले पश्चिम को वे हम भारतीयों द्वारा दिया गया एक बेमिसाल उत्तर थे. इस अर्थ में वे विवेकानंद और रविन्द्रनाथ की कड़ी के ऐसे भारतीय थे, जिसने पश्चिम को यह पूर्वी आईना उनकी भाषा में इतने सामर्थ्य के साथ दिखाया था.

वे एक ऐसे महान मुस्लिम थे जिसको इस देश का हर हिंदु, सिख, जैन ईसाई और बौद्ध प्यार करता था. प्यार ही नहीं करता था बल्कि अपने बच्चों को उनकी प्रेरणादायक किताबें पढ़ने को देता था और जीवन में उनके जैसा बनने की प्रेरणा देता था. और यह मुकाम उन्होंने धर्मनिरपेक्षता पर लंबे चौड़े भाषण देकर हासिल नहीं किया था बल्कि  वास्तविक अर्थो में इसी भारतीय भूमी में जन्मे या पनपे समस्त धर्मो के मूल सार को अपने रोजाना के जीवन में उतार कर हासिल किया था. उनका अपना जीवन इस बात की मिसाल है कि राष्ट्र की एकता समाज को बाँटने वाले कानूनों और कथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुछ परिवारों के अयोग्य वारिसों को सदा सर्वदा के लिए अपने सर पर बिठाने से नहीं आयेगी बल्कि हर समूह और अस्मिता द्वारा राष्ट्र निर्माण के इस अनवरत यज्ञ में अपनी सर्वोत्तम आहूति देने के बाद अपने आप आ जायेगी. दण्डकारण्य के उत्पाती वानर यदि रामराज्य में पूज्यनीय देवता बन सकते थे तो छोटी बड़ी अस्मिताओं के नाम पर भटके हुए हमारे आज के युवा क्यों नहीं एक विशाल भारतीय सपने का सम्मानित हिस्सा बन सकते है?

वे एक ऐसे राष्ट्रपति थे, जिनका सम्मान इस पद पर बैठने के पूर्व ही इस पद से अधिक हो चुका था.  जिस दिन वे भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ ले रहे थे, हर भारतीय मानो खुद के अच्छे चयन को लेकर खुद को ही बधाई दे रहा था. इस पद पर रहते हुए उन्होंने पूरे भारत के कोने कोने में जाकर देश की युवा पीढ़ी को राष्ट्र के भविष्य के लिए सपने देखने का आव्हान किया और महान जीवन जीने के नुस्खे सिखाए. और ये नुस्खे भी ऐसे थे मानो गीता का कृष्ण आज के  अर्जुन को पुकार रहा हो, जैसे कि धम्म पद से बुद्ध इस देश की करुणामय प्रतिभा को आवाज दे रहे हो. जैसे कि कोई सूफी संत अपने सूफी जीवन नृत्य में हम सभी को शामिल होने का आमंत्रण भेज रहा हो. वे हमारी पीढ़ी के ऐसे भारतीय थे जिनका होना ही एक संदेश था. पश्चिम की ओर मुखातिब इस दौर में जिनका होना ही अपनी जड़ों का अहसास दिलाने के लिए पर्याप्त था. 

आज उनके जाने से मेरे भीतर का भारतीय मन उदास है.. आँखों में आँसू है.. किंतु कहीं गहरे में एक शपथ भी अंगड़ाई ले रही है..

श्रीमान कलाम! हम आपको मरने नहीं देंगे.. आपकी स्मृतियों का सम्मान करते हुए हम सभी अपनी अपनी क्षुद्र अस्मिताओं से उपर उठेंगे और इस देश को इसका खोया हुआ गौरव वापस दिलाने के लिए अपनी प्रतिभा, कला, धर्म और संस्कृति का सर्वोत्तम प्रदान करेंगे.. 

एक महान भारतीय राष्ट्र के जन गण मन बन कर हम आपका अधूरा स्वप्न पूरा करेंगे...

जय हिंद.. जय भारत...

दिनेश शर्मा

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