याकूब मेमन और टीवी बहस का नया पतन
मान लो कि आप और मैं टीवी स्टूडियो की किसी बहस का हिस्सा है. अचानक
बहस हिंसक हो जाती है. आप सारे देश के दर्शकों के सामने मुझे एक तमाचा जड़ देते
है.. सारा देश देख रहा है, वहाँ बैठे कर्मचारी बीच बचाव कर मुझे आपसे दूर कर देते
है.. अब मेरे सामने न्याय पाने के केवल चार रास्ते बचते है, पहला तो यह कि यदि मैं आपसे बलशाली हूँ तो मैं वहीं
आपको जवाबी तमाचा मारूँ और अपना हिसाब चुकता कर लूँ. दूसरा यह कि यदि मैं आपसे
कमजोर हूँ तो आपसे शक्तिशाली किसी बलशाली
की तलाश करूं और आपको सुधारने का जिम्मा उसे सौंप दूँ. तीसरा पुलिस में शिकायत
देकर आपको कानून के दायरे में ले आऊं और देश के कानून के अनुरूप पुलिस को आपके
विरुद्ध सबूत जुटाने में सहायता देकर आपको सजा दिलवाने का प्रयास करूँ. अंतिम, यदि
पुलिस भी मेरी बात को सुनने को तैयार नहीं है तो मैं सीधा न्यायालय में मुकदमा
दायर करूँ और आपको कानून के सामने पेश होने को मजबूर करके न्याय की गुजारिश करूँ.
पहले दो मामले में मैं भले ही व्यक्तिगत रूप से मजबूत साबित हो जाऊं,
एक न्यायिक व्यवस्था के रूप में देश कमजोर साबित होगा. क्योंकि सजा देने का काम
देश का है, मेरा या किसी व्यक्ति का नहीं. बाद के दोनों मामलों में दो संभावना है.
या तो आप का अपराध साबित नहीं होगा और आपको बाइज्जत बरी कर दिया जायेगा. इसमें भले
मेरी व्यक्तिगत हार हो जाये, किंतु देश की जीत हुयी, ऐसा माना जायेगा. किंतु मान
लो कि मैं आपका अपराध साबित करने में सफल हो जाता हूँ और आपको सजा देने का वक्त आ
जाता है. क्या उस हालात में आप सजा से बचने के लिए यह तर्क दे सकते हैं कि पहले इस
शहर के इतिहास के तमाम तमाचों की भी जाँच हो और उनके अभियुक्तों को भी न्यायालय के
सामने लाया जाये, उन्हें भी सजा दी जाये, उनके साथ या उनके बाद में मेरी सजा का
विचार करना. तब तक के लिए मुझे मेरी अन्य मनमानियों के लिए खुला छोड़ दिया जाये?
चलो, तमाचे जैसे मामूली अपराध की बात जाने दीजिए. क्या हत्या,
बलात्कार, डकैती, तेजाब फेंक कर बदरूप कर देने जैसे मामलों के अभियुक्त सजा से
बचने के लिए यही तर्क दे सकते हैं? क्या किसी चोरी की सजा के अभियुक्त का वकील
न्यायालय के सामने यह तर्क दे सकता है कि पहले इस शहर में आज तक हुयी तमाम चोरीयों
के अभियुक्तों को भी न्यायालय के सामने लाया जाये, उनकी सजा का फैसला होने के बाद
ही मुझे भी सजा दी जाये, अन्यथा मुझे अभी छोड़ दिया जाये. क्या किसी मासूम के
बलात्कार और नृशंस हत्या का दोषी अपने बचाव में यह कह सकता है कि पहले मेरे पूर्व
और बाद के समस्त बलात्कारियों को सजा दी जाये और बाद में ही मेरी सजा पर फैसला हो.
क्या कोई भ्रष्टाचारी नेता, सजा की घोषणा होने पर इसी आधार पर सजा से बचने का तर्क
देता है कि पहले दूसरों के भ्रष्टाचार की जाँच हो और उन्हें सजा दी जाये, बाद में
मेरी सजा की घोषणा हो. तब तक के लिए मुझे मेरी मनमानियों के लिए खुला रखा
जाये.
क्या यह तर्क कोई सभ्य व्यवस्था स्वीकार करेगी? और मान लो कि यह
कुतर्क स्वीकार कर लिया जाता है, तो क्या कोई व्यवस्था कही जाने वाली चीज देश में
बचेगी और भीड़ का बदले का निजाम हमारी आपकी सभी की जिंदगी को लील नहीं लेगा? क्या
उस व्यवस्था में लोग अपने मामले सड़कों पर निपटाने के लिए प्रवृत नहीं होंगे? क्या
यह व्यवस्था कमजोरों को सदा के लिए न्याय से वंचित नहीं कर देगी?
देश के तमाम समाचार चैनल्स पर याकूब मेमन के मामले में पिछले दो दिनों
में जारी बहस का कुल निचोड़ यही है. पहले दूसरों के मामले निपटाइए और बाद में मेरी
ओर झांकिये. यदि आप दूसरों को सजा नहीं दे सकते तो मुझे भी सजा देने का आपको कोई
हक नहीं है. इस बहस से पत्रकारों और राजनैतिक प्रवक्ताओं की अक्ल का केवल
दिवालियापन ही साबित होता है. जो देश
पिछले तीन दशकों से आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित देशों में शुमार किया जाता हो,
जहाँ की संसद पर बारूदी हमला हो चुका हो, आर्थिक नाभी पर चोट की जा चुकी हो, उस
देश के टीवी स्टूडियोज् में पिछले दो दिनों में बहस का स्तर मानो निम्न से निम्नतर
होने की होड़ कर रहा था. उन तमाम लोगों के
लिए, जो ऐसे तर्क देते है और उनके लिए, जो ऐसे तर्क देने वालों के लिए माइक, मंच और माहौल का इंतजाम करते है,
आतंकवाद और अपराध कोई समस्या नहीं है, व्यवस्था पर अविश्वास कोई मुद्दा ही नहीं
है.
सजा में होनेवाली दशकों की देरी, हमारी न्यायिक व्यवस्था की सुस्त
रफ़्तार अक्सर लोगों को भीड़तंत्र की ओर आकर्षित करती है. अभी गुरदासपुर हमले के
दौरान ट्विटर पर जो संदेश आ रहे थे, उनका संकेत यही था कि हमलावरों को वहीं निपटा
दिया जाये, न्यायिक प्रक्रिया का झंझट पालने की आवश्यकता ही नहीं है.
एक ओर जहाँ टीवी की बहस किसी भी सजा को असंभव बना देगी, वहीं दूसरी ओर
ट्विटर की बहस किसी भी न्यायिक प्रकिया को. दोनों स्थितियां हमें केवल अराजकता की
ओर ले जाती है. दुर्भाग्य यही है कि एक अराजकता समाज के तथाकथित बुद्धिमानों
द्वारा निर्मित होगी तो दूसरी राह चलते नासमझ नागरिकों द्वारा. अल्पसंख्यकों के
बचाव में जो तर्क टीवी की बहस में दिए गए, उनसे केवल अल्पसंख्यक ही खतरे में
पड़ेंगे, बहुसंख्यक नहीं. क्योंकि अराजकता की स्थिति कहीं भी हो, उसके सबसे बड़े
शिकार तो अल्पसंख्यक ही होते है. न्यायिक प्रक्रिया तो होती ही कमजोर की रक्षा के
लिए है.
हमारे पड़ौसी देश, इन मामलों से कैसे जूझ रहे हैं, चलो यह भी देख लेते
है. पाकिस्तान ने पेशावर की स्कूल पर हमले के बाद महज पिछले छह महीनो में कुल १८० से ज्यादा लोगों को फांसी के फंदे के
हवाले किया है. उसने एक-एक दिन में बीस-बीस लोगों को क़ानूनी तरीके से उनके घृणित
अपराधों के बदले में अंतिम मुकाम दिखाया है. बांग्लादेश ने २००८ के बाद ही कुल २५
लोगों को इसी अंदाज में उनके अपराधों की सजा दी है. श्री लंका में भले किसी को
फांसी नहीं दी गयी हो किंतु उन्होंने अपने विरोधियों को बिना किसी सुनवाई के युद्ध
के मैदान में ही निपटा दिया है. आज भी उसके भूतपूर्व राष्ट्रपति सारी दुनिया में
युद्ध अपराधी के रूप में ही याद किये जाते है. बर्मा ने तो अपने यहाँ सदियों से रह रहे अल्पसंख्यकों की नागरिकता
को ही नकार दिया है और उन्हें असुरक्षित जहाजों में बिठाकर भूख और प्यास से मरने
के लिए समंदर की विकराल लहरों के हवाले कर दिया है. चीन और अन्य साम्यवादी
राष्ट्रों की तो बात ही जाने दीजिए. वहाँ तो अपने विरोधियों को बिना किसी सुनवाई
के गायब कर देने या भूखे कुत्तों के सामने फेंक कर काम तमाम करने की ताजा-ताजा
मिसालें मौजूद है.
क्या इसके मुकाबिले हम रात को तीन बजे सुनवाई करने वाले हमारे
सर्वोच्च न्यायालय पर गर्व नहीं कर सकते? फांसी की सजा हो या ना हो, यह बहस का
विषय हो सकता है. किंतु क्या यह बहस अभी एक ऐसे व्यक्ति के लिए जरुरी थी, जिस पर
किसी दुश्मन देश के साथ मिलकर देश पर हमला करने का आरोप साबित हो चुका हो? क्या
किसी गलत पात्र के प्रति गलत समय पर सहानुभूति का दुराग्रह, समाज की समग्र
संवेदनशीलता को सदा के लिए कुंठित करने का काम नहीं करेगा?
यदि ऐसा होता है, तो इसके असली शिकार कौन रहेंगें? अल्पसंख्यक या
बहुसंख्यक?
दिनेश शर्मा
No comments:
Post a Comment