वामपंथी लिबरल और सनातन
संस्था
एड. दिनेश शर्मा
९१३०३२७६६४
जब से सनातन भारत संस्था से जुड़ा समीर गायकवाड़
नामक कार्यकर्ता कामरेड गोविन्द पानसरे हत्या प्रकरण में पुलिस की गिरफ्त में आया
है, टीवी की बहस में तमाम वामपंथी लिबरल प्रवक्ता इस संस्था पर बंदी लगाने की मांग
कर रहे हैं. अभी तक इस संस्था की कामरेड गोविन्द पानसरे हत्या या महाराष्ट्र के
प्रसिद्द विचारक श्री दाभोलकर की हत्या में
भागीदारी साबित नहीं हुयी है, किंतु भाजपा का शासन हो और हत्यारा कथित
हिन्दुवादी विचारधारा से ताल्लुक रखता हो तो वामपंथियों की बल्ले बल्ले होना
स्वाभाविक ही है. महाराष्ट्र में सभी टीवी चैनल्स की बहस में एक बेहद आश्चर्यजनक
सच्चाई सामने आती दिखाई देती है, वह है कथित समाजवादियों और वामपंथियों के प्रति
उदारताभरा सम्मान और कथित दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रति अतिशयोक्तिपूर्ण
तिरस्कार.
वास्तव में महाराष्ट्र देश का एक ऐसा प्रदेश
है जहाँ धर्मनिरपेक्ष राजनीति कभी भी इस हालात में नहीं रही कि वह दक्षिणपंथी
राजनीति को चुनौती दे सके. समूचे प्रदेश में जो भी गिने चुने अल्पसंख्यक या दलित नेता
है, उनकी अपनी कोई जमीन या तगड़ा वोट बैंक नहीं है, और वे सारे अपने अस्तित्व के
लिए काँग्रेस या राष्ट्रवादी काँग्रेस की मेहरबानी पर ही राजनीति करते आये है.
महाराष्ट्र में हिंदुत्ववादी राजनीति का असली मुकाबला कथित रूप से कांग्रेसी और
समाजवादी विचारधारा से है. महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेता भी देश के बाकी प्रदेश के
नेताओं की तरह केवल गाँधी परिवार की जयजयकार नहीं करते बल्कि सबके अपने महाविद्यालय,
विश्वविद्यालय और सहकारी कारखानों के साम्राज्य है. वे विलासितापूर्ण जीवन जीने के
मामले में किसी भी अंबानी या विजय मलाया को शर्मिंदा कर सकते है. उनके पास इतना
पैसा है कि भाजपा और शिवसेना वाले भी उनको चारा डालते रहते है. अत: गाँधी परिवार
को उनकी जरूरत है, उन्हें उसकी नहीं.
राज्य में जितने समाजवादी, वामपंथी या दलित विचारक
है या तो वें स्वयं या उनके घर का कोई प्रमुख सदस्य इन कांग्रेसी या राष्ट्रवादी
काँग्रेस के नेताओं के सहकारी कारखानों या शिक्षा संस्थानों में नौकरी पर है. अत:
वे भी अपने हमलों की धार आम तौर पर काँग्रेस और राष्ट्रवादी के नेताओं के सामंती
जीवन के प्रति सौम्य ही रखते हैं. काँग्रेस और राष्ट्रवादी के ये तमाम नेता मराठा
अस्मिता के मुख्य प्रवर्तक महान छत्रपति शिवाजी को अपना आराध्य मानते है, महात्मा
गाँधी को नहीं. कभी इसी प्रदेश से काँग्रेस में गरम दल का प्रतिनिधित्व करने वाले
लोकमान्य तिलक का जन्म हुआ था, जिन्हें आज भी लोग आधुनिक भारत का पहला लोकप्रिय राष्ट्रीय
नेता मानते है. स्वातंत्र्य वीर सावरकर के प्रति लोग दलगत मतभेदों से उपर उठकर
सम्मान रखते हैं. स्थानिकों की अस्मिता को सभी दल खाद-पानी डालते रहते है. शिवसेना
का सहारा लेकर काँग्रेसी पहले ही वामपंथ को तडीपार कर चुकी है.
इसप्रकार मूल रूप से यहाँ की काँग्रेस और
राष्ट्रवादी की राजनीति भी दक्षिणपंथी ही है, राहुल गाँधी या सोनिया गाँधी के
सपनों की तरह वामपंथी नहीं. अत: महाराष्ट्र में सरकार किसी भी पार्टी की हो, वास्तव
में सत्ता में दक्षिणपंथ ही हावी रहता है और अल्पसंख्यकों या वामपंथियों के लिए
राजनीति में हाशिए पर भी कोई जगह शेष नहीं है. अब इन कथित वामपंथी लिब्रल्स के लिए
जमीन पर तो कोई काम बचा नहीं है, तो वे अपने आपको व्यस्त रखने के लिए हिन्दुवादी समूहों
से भिड़ते रहते हैं और चर्चा में बने रहते हैं. कभी अंधश्रद्धा हटाने के नाम पर तो
कभी किसानों के लिए पानी की कमी के नाम पर कुम्भ मेले पर बंदी लगाने को लेकर, वामपंथी
लिब्रल्स का सारा जोर हिन्दुवादी संघठनों से पंगा लेने में लगा रहता है क्योंकि
कांग्रेसी इनके जीवनयापन की व्यवस्था करते रहते हैं.
आज तक महाराष्ट्र में किसी भी समाजवादी या
वामपंथी नेता ने कांग्रेसियों और राष्ट्रवादी के नेताओं से राज्य की तबाही पर कोई
सार्थक प्रश्न नहीं पूछा है, उनके शिक्षा
संस्थानों में शिक्षा के बदतर स्तर और भ्रष्टाचार पर कभी किसी ने हाईकोर्ट में कोई
याचिका दाखल नहीं की है और ना ही किसानों की आत्महत्या पर उन्होंने कभी किसी वैचारिक
बहस को जन्म दिया है. महाराष्ट्र के
समाजवादी विचारकों ने काफ़ी पहले अपना जमीर और आंदोलन कौशल्य काँग्रेस के सहकार
सम्राटों के दरबारों में मानो गिरवी रख दिया था. इसीलिए राज्य को अपना पहला काँग्रेस
विरोधी जनआंदोलन शुरू करने के लिए भी अस्सी के दशक तक इंतजार करना पड़ा जब
स्विजरलैंड से आये भारतीय विदेश सेवा के एक बुद्धिमान अधिकारी श्री शरद जोशी ने अपने
किसान आंदोलन, शेतकरी संघठन के माध्यम से कृषी के शोषण पर अपनी आँकड़ेवारी पेश करके
उनकी सत्ता की चूलें हिला दी थी.
ये तमाम वामपंथी लिब्रल्स नक्सलवादी हिंसा को
प्रोत्साहित करने के जुर्म में पकड़े गए जेएनयू के प्राध्यापकों की गिरफ़्तारी के
समय मानव अधिकारों की बातें करते हैं, अमेरिका और इराक के युद्ध में जार्ज बुश को
कोसते हैं, कश्मीर में मानव अधिकारों के हनन पर घड़ियाली आँसू बहाते हैं और किसी हिन्दुवादी
अदने से कार्यकर्ता के दो कौड़ी के बयान पर घंटों चर्चा की सामग्री जुटा लेते है.
भाजपा सांसद सुश्री निरंजन ज्योति, योगी आदित्यनाथ. साक्षी महाराज और साध्वी प्राची
जैसे बयान बहादुर उन्हें जीने और अपने अस्तित्व का अहसास दिलाने का समान जुटा देते
हैं.
जब से राज्य में देवेन्द्र फडनवीस और केन्द्र
में नरेंद्र मोदी की सरकार आयी है, उनके जीवन में मानो वसंत आया हुआ है. उनके कृतिशून्य
और परावलम्बी जीवन के इस संध्याकाल में हर चैनल उनके विचारों को ऐसे पेश कर रहा है
मानो ये कल के मुक्त, उन्नत और समृद्ध महाराष्ट्र का कोई सपना दे रहें हो. जबकि
उनके अपने जीवन विचारों की दरिद्रता, वामपंथी अधिनायकवाद और तकनीक के मामले में
पूरी तरह प्रतिगामी है. महाराष्ट्र को पहले भी उनसे केवल निराशा हाथ लगी है, अब तो
वैसे भी दुनिया काफ़ी बदल चुकी है. कृतिवीर महान छत्रपति और भारतीय असंतोष के जनक लोकमान्य
का महाराष्ट्र इनसे प्रेरणा भी ले तो किस बात की..
अत: जिस संस्था पर आज तक कांग्रेसी राज्य और केन्द्र
में दशकों तक सत्ता होने के बावजूद पाबंदी नहीं लगा सके, उस हिन्दुवादी संघठन पर
ये मोदी सरकार से पाबंदी लगाने की मांग कर रहें हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के
इस दौर में जब फेसबुक, ट्विटर और तकनीक के नये नये माध्यम किसी भी पाबंदी को
नाकारा साबित कर सकते है, ये एक संस्था पर केवल इसलिए पाबंदी की मांग कर रहें हैं
क्योंकि इनकी अपनी अभिव्यक्ति पर कोई प्रश्न नहीं खड़ा कर सके..ये उसे बहस से हराना
नहीं चाहते, बस सरकारी डंडे या कानून से मौन करना चाहते है..
अत: सनातन भारत संस्था के अधिकांश विचारों से
असहमत होते हुए भी मैं उसकी अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करता हूँ. मैं उनके
हाथों से पिस्तौल या तलवार तो छीन सकता हूँ, कलम नहीं. कभी फ़्रांस के महान विचारक वाल्तेयर ने कहा था:-
“I do not agree with what you have to say, but I'll
defend to the death your right to say it.”
एड. दिनेश शर्मा

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