Thursday, September 10, 2015

हिंदु अस्मिता और जैन शाकाहार


हिंदु अस्मिता और जैन शाकाहार

भगवान महावीर के अनुयायी जैन धर्मियों का पर्युषण पर्व सृष्टि  के कण कण में व्याप्त अनादि अनंत जीवन की धडकनों के प्रति मनुष्य द्वारा अभिव्यक्त आभार प्रदर्शन का एक पर्व है. यह जाने-अनजाने जीवन की हर एक अभिव्यक्ति के प्रति मन, वचन और कर्म से की गयी हिंसा के लिए क्षमायाचना का एक बेमिसाल अवसर माना जाता है. इन दिनों में जैनबंधु समूचे वर्ष भर में किये अपने जाने-अनजाने गुनाहों की क्षमा माँगते है, और एक दूसरे के साथ अपने संबंधों की नई पारी शुरू करते है.

मूलत: भारत के पश्चिमी प्रान्तों में रहने और कारोबार करनेवाला यह अल्पसंख्यक समूह पारसियों और सिखों की ही तरह देश के समग्र आर्थिक विकास में अपनी जनसंख्या के अनुपात में काफ़ी बड़ा योगदान करता है. इस समूह के मंदिर, स्कूल, छात्रालय, धर्मादा दवाखाने और सामाजिक भवन तुलना में गरीब विशाल हिंदु समाज के लिए एक बेहद अहम सहारा है, जो युगों युगों से जारी है.  साक्षरता की दृष्टी से भी यह भारत का सबसे पढ़ा लिखा समाज है, जहाँ आज की घड़ी में साक्षरता-दर, पुरुष और महिला, दोनों में ९८% प्रतिशत के आसपास है. एक अल्पसंख्यक समूह के रूप में इसने देश से शायद ही कभी कुछ माँगा हो. उलटे राष्ट्र निर्माण में इनका प्रति-व्यक्ति योगदान अपनी संख्या से कई गुना ज्यादा का ही है. अपनी कर्मशील प्रतिभा और समावेशी व्यवहार के कारण राजनीति और प्रशासन में भी इनका प्रतिनिधित्व अपनी जनसँख्या के अनुपात में शायद ही कभी कम रहा हो. देश के सर्वोच्च न्यायालय के कई दिग्गज न्यायाधीशों में जैन और पारसी न्यायाधीश अलग से उठकर दिखाई देते रहे हैं. भले ही सेना में उनका योगदान नगण्य रहा हो, किंतु अपने उद्योगों से जो समृद्धि उन्होंने पैदा की है, उससे सेना के लिए हथियार तो ख़रीदे जा ही सकते है.  

जैन विश्व के किसी भी कोने में हो, अपनी मौजूदगी से अपने वातावरण को समृद्ध और साफसुथरा ही बनाते है. इसके धर्मगुरु  समस्त हिंदुओं के लिए मार्गदर्शक और प्रेरणादायी ही नहीं माने जाते बल्कि उनमें से कई तो हिंदु परिवारों में जन्मे हैं. उनकी किताबें और सीडीज हिंदुबांधव भी खरीद कर अपने व्यवहार को और अधिक पारिवारिक और सामाजिक बनाने की कोशिश करते हैं. जहाँ कई कथित हिंदु साधु सन्यासी अपनी अय्याश और दिखावटी जीवन शैली के कारण हमारे मन में जुगुप्सा पैदा करते है, वहीं जैन संतों का जीवन अनगिनत भौतिक सुखों के इस दौर में भी समाज के एक बड़े हिस्से के लिए ना केवल अनुकरणीय  रहा है बल्कि उसकी त्याग और तपस्या से अनुप्राणित धार्मिक प्यास को भी बुझाता रहा है.

इतिहास के पन्ने गवाह है कि हिंदुओं ने यदि अहिंसा और शाकाहार को अपनी धार्मिक सोच का अभिन्न अंग बनाया है तो उसका सारा श्रेय बुद्ध से भी ज्यादा इन जैनों को जाता है. आज आपको अधिकांश वैष्णवों के खानपान और जैनों के खानपान में राई-रत्ती का भी अंतर नहीं मिलेगा. महात्मा गाँधी का सबसे प्रसिद्ध भजन, “वैष्णव जन तो तेने कहिये” वास्तव में इसी जैन और हिंदु वैष्णव अहिंसक जीवन परंपरा का उद्घोष मात्र है. महाभारत के शांति पर्व में अहिंसा और शाकाहार के पक्ष में जो आख्यान आये हैं, वे सदियों से हिंदु मानस का अविभाज्य अंग रहे हैं. शायद इसी कारण अधिकांश अस्त्र-शस्त्र धारी हिंदु देवी देवताओं को भी प्रसाद केवल फल फूल का ही चढ़ाया जाता रहा है. मेरी स्मृतियों में आज भी विधानसभा के तीन दशक पुराने इतिहास के वे पन्ने ताजा है, जब इन हिंदु देवी देवताओं को माँसाहारी बताने वाले काँग्रेस के वर्धा के तत्कालीन विधायक मानिकराव सबाने पर विधानसभा में स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना और भाजपा के सभी विधायक टूट पड़े थे. आज मानिकराव सबाने जीवित नहीं है, किंतु उन पर हमला करनेवाले भाजपा के तत्कालीन विधायक अरुण अडसड आज भी राज्य की राजनीति में सक्रिय है.  

आज उन्ही जैनों के अपने पर्युषण पर्व में शाकाहार के प्रति आग्रह ने शिवसेना की हिंदु अस्मिता को जख्मी कर दिया है. जख्मी भी इतना कि शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे को उन्हें अपने समाचार पत्र में एक लंबा चौड़ा संपादकीय लिख कर चोर, दलाल और दो नंबरी जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए धमकाना पड़ा है. जैनों से पूछा गया है कि क्या वे पर्युषण पर्व में अपने दो नंबर के व्यापार या काली कमाई  बंद कर देते है? और तो और उद्धव ने उन्हें १९९३ के दंगों की याद तक दिला दी, जिसमें मुस्लिमों के कथित हमलों से बालासाहेब की शिवसेना ने ही उन्हें बचाया था. आगे यह संपादकीय उन्हें धमकाता है कि उनके सारे कारोबार को बंद करने में शिवसेना को अधिक समय नहीं लगेगा.

१९९३ के दंगों के बारे में उद्धव शायद यह भूल गए है कि मुस्लिमों का आक्रोश रामजन्मभूमि विवाद के चलते हिंदुओ के ही विरुद्ध था, जैन तो बेचारे मुफ़्त में उस आक्रोश में पिसे जाने वाले थे क्योंकि वे हिंदुओं के साथ उठते-बैठते उनके जैसे ही लगते है.  अन्यथा जैनों की मुस्लिमों से दुश्मनी क्या थी? यदि सारी दुनिया जैनों को हिंदु समझती है और हिंदुओं के साथ अपने कथित संघर्ष में उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाती है तो इसमें जैनों का दोष क्या है? क्या उन्होंने हिंदुओं जैसे अपने रहन सहन को बदलकर यह घोषणा कर देनी चाहिए कि हमारा हिंदुओं से कोई लेना देना नहीं है? क्या ऐसी किसी घोषणा को उद्धव पचा पायेंगे?

उद्धव ठाकरे का जैनों के व्यापारिक कौशल्य पर ऊँगली उठाना क्या साबित करता है? क्या हिंदु उद्यमियों को भी उद्धव पूछना चाहेंगे कि वे दीवाली, दशहरे और रक्षा बंधन पर दो नंबर की कमाई लेना बंद कर दें? जैनों के व्यापार को उद्धव ने उनके धर्म से जोड़कर हमला किया है. क्या हिंदु साधु संतों के अश्लील और दिखावटी व्यवहार पर हिंदु अस्मिता के एकमेव रक्षक के रूप में उद्धव उन्हें कोई सलाह देना नहीं चाहेंगें? आज तक सामना के किसी भी संपादकीय में आसाराम बापू हो, नित्यानंद हो या राधे माँ, किसी पर कोई हमला नहीं किया गया है. क्या उद्धव अपनी हिंदु अस्मिता की रक्षा के लिए उन्हें खुला छोड़ देना चाहते है? अपने दादा प्रबोधनकार की तरह उनकी असली हिम्मत की परीक्षा तो तब होती जब वे हिंदु हितों की बात करते हुए कभी हिंदुओं की इन कमजोर नसों का भी जिक्र करते, ना कि एक बेहद छोटे से समाज विशेष के प्रति अपने कार्यकर्ताओं को उकसाते.  

किंतु यूँ लगता है कि उद्धव गत विधानसभा चुनाव में अपनी करारी हार के सदमें से अभी तक नहीं उबर पाए है. भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह जैन है, इसलिए अपने जीवन में पहली बार शिवसेना आज जैनों के आमने सामने है. कभी शिवसेना ने दक्षिण भारतीयों को नाराज किया था, फिर हिंदी भाषियों को और अब गुजराती और जैन उसके निशाने पर है. उनके पिता बालासाहेब बड़े दिल के थे इसलिए लोग उनकी बातों का बुरा नहीं मानते थे. वे सभी के दोस्त थे और कोई भी अपनी मुसीबत में मातोश्री का दरवाजा खटखटा सकता था. उनके निष्पक्ष, उदार किंतु साहसी व्यवहार से मराठी अस्मिता को शक्ति मिलती थी. उनकी भाषा दिल से निकलकर दिल को छूती थी, इसलिए उनके दुश्मन भी उन्हें टिकाये रखना चाहते थे.  समूचे हिन्दुस्थान में बालासाहेब को लोग चाहते थे, भले ही उनकी पार्टी, उनकी विचारधारा अलग रही हो. इसलिए वे अपने जीवनकाल में ही एक मिथक बन गए थे. उद्धव से तो उनके अपने करीबी भी मिल नहीं पाते है. उन्होंने राजनीति में केवल दुश्मन ही निर्मित किये है. अपनी पार्टी के बड़े बुजुर्गों को उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपमानित करवाया है. जो उन्हें छोड़कर गए, वे वापस आना नहीं चाहते. नतीजतन उद्धव का आज कोई मित्र नहीं है.

उद्धव यदि थोड़ा भी जैन धर्म और उसकी बुनियादी मान्यताओं को जानते, समझते और अमल में लाते तो शायद इस पर्युषण पर्व पर अपने व्यवहार से दुखी समस्त पुराने मित्रों  को पत्र लिखकर क्षमायाचना कर लेते और राजनीति में अपने मित्रों की संख्या बढ़ाते.  दुर्भाग्य से क्षमायाचना के इस महान पर्व पर भी उन्होंने अपने मित्र कम, विरोधी ही अधिक बढ़ाये हैं.

जैनों की संख्या कम है, अत: वे राजनीति में वोटों की दृष्टी से किसी का भी खेल खराब करने की ताकत शायद नहीं रखते हो. किंतु हिंदु दर्शन में भी छोटा कहाँ अक्सर छोटा माना जाता है. हिंदु अस्मिता के प्रेरणा पुरुष मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम तो रामेश्वरम और धनुषकोटि के बीच खड़े किये जानेवाले सेतुसमुद्रम के लिए एक गिलहरी के भी सहयोग को इतनी गरिमा से स्वीकृति देते है कि यह गाथा हमारे मिथकीय आख्यानों में स्वर्णाक्षरों से लिखी जा चुकी है. क्या उद्धव अपने सेतुबंध के लिए इन गिलहरियों का सहयोग लेना नहीं चाहेंगें?


दिनेश शर्मा

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