Saturday, December 12, 2015

शरद जोशी- एक कंठ विषपायी

शरद जोशी- एक कंठ विषपायी


मुझे उनसे मुलाकात की तारीख आज भी याद है, २३ दिसंबर, १९९४. अपनी नयी-नयी राजनैतिक पार्टी ‘स्वतंत्र भारत पक्ष’ के लिए जन समर्थन जुटाने के लिए शरद जोशी पुलगांव आने वाले थे. पुलगांव के श्री विजय राठी और नंदकिशोर काले जैसे उनके कुछ कार्यकर्ता मेरे पास प्रस्ताव लेकर आये थे कि शरद जोशी की पुलगांव की प्रस्तावित सभा की अध्यक्षता मैं करूं. मैं उस दौर में अपने मुक्त अर्थव्यवस्था समर्थक विचारों के लिए जाना जाने लगा था. १९८९ में भाजपा से जुड़कर, किन्तु बाद में उनकी कट्टर स्वदेशी वाली नारे बाजी से निराश होकर मैं भाजपा से भी अलिप्त हो चुका था.  शरद जोशी की नयी पार्टी का घोषणापत्र मानो मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता की मेरी ही संकल्पनाओं की अभिव्यक्ति था. रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्व प्रसिद्ध कविता  जहाँ चित्त भयशून्य, उन्नत जहाँ भाल हो’ इस घोषणापत्र के मुखपृष्ठ पर छपी थी. मैंने उनकी सभा की अध्यक्षता करना स्वीकार कर लिया. पुलगांव के अग्रवाल बाड़े में २३ दिसंबर १९९४ को यह सभा हुयी. वे मुख्य वक्ता होने से मेरा अध्यक्ष का भाषण उनसे पहले ही निपटा दिया गया. मैंने अपनी विनोदी शैली में पहले ही सभा को उठा दिया था. शरद जोशी ने उसे और भी नयी ऊचाईयों पर पहुंचा दिया. जनसमूह मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुन रहा था. उनका भाषण मेरे भीतर की ओजस्विता को नए आयाम दे रहा था. वे अपने भाषण में बार बार मेरा संदर्भ दे रहे थे. मेरे जैसे नवयुवक के लिए यह एक बेहद शाबासी वाला मामला था. भाषण देकर मैं अपने घर और वे एक कार्यकर्ता श्री दिनेश धांदे के घर पर चाय पानी के लिए निकल गए.  कुछ ही देर में एक कार्यकर्ता मेरे घर पर आकर कहने लगा कि आपको साहब ने बुलाया है. मैं त्वरित उनसे मिलने पहुंच गया. मुझे कार्यकर्ता उनके पास लेकर गए. वे सीधे विषय पर आ गए. उन्होंने कहा  ‘दिनेशजी, आपकी ओजस्वी हिंदी और हमारे तर्कपूर्ण विचारों का यदि जोड़ बैठ जाए तो दुग्ध-शर्करा योग उत्पन्न हो जायेगा.’ मैंने बिना एक क्षण का विलंब किये तत्क्षण उनके सपनों के भारत के लिए अपनी उर्जा और अपनी भाषण शैली का समर्पण देने की घोषणा कर दी.

इसके साथ ही शुरू हो गयी मेरे जीवन की एक अद्भुत ज्ञान यात्रा, जो मुझे उनके साथ महाराष्ट्र के हर एक तालुका तक लेकर गयी.  आज यह मेरा अखंड विश्वास है कि पिछले बीस साल उनकी अद्भुत विद्वता के साये में जीना पूर्वजन्म के किसी संचित पुण्यकर्म के बिना बिलकुल ही संभव नहीं था. केवल उनसे अपने प्रेम के कारण, मैं, जोकि एक मारवाड़ी दुकानदार के घर में जन्मा था, किसानों के प्रवक्ता के रूप में महाराष्ट्र भर में जाना गया. उनके चाहनेवाले अनगिनत बेहद बुद्धिमान और भावुक नेताओं और कार्यकर्ताओं से मैं मिल पाया. उनकी प्रतिभा के बेमिसाल तराजू ने श्रेयस और प्रेयस की जंग में श्रेयस को चुनने की पात्रता और हिम्मत मुझे प्रदान की और छिछली नारेबाजी और अध्ययनशील गरिमा के बीच का अंतर समझने की योग्यता मुझे हासिल हुयी. उनकी प्रखरता और ओजस्विता ने मुझे अनादि अनंत युगों की यात्रा पर निकले प्रवासी शाश्वत नक्षत्रों और अल्पजीवी जुगनुओं के बीच के फर्क को समझने का माद्दा प्रदान किया, जिससे प्राप्त सामर्थ्य के कारण मेरा मस्तक हर कहीं झुकने से इंकार करने लगा.   

मुझे कभी-कभी लगता है कि शायद उनके समान प्रखर प्रतिभा का धनी महाराष्ट्र की प्रतिभा उर्वर भूमि में ही जन्म ले सकता था , जिसने कभी महाराष्ट्र माउली संत ज्ञानेश्वर  और संत श्रेष्ठ तुकाराम को जन्म दिया था, जिसने महान छत्रपति के समान संघठक और तिलक और सावरकर के समान विद्रोहियों को जन्म दिया था. जिस भूमि की पावन गोद जहाँ ज्योतिबाफुले और डॉ अम्बेडकर के समान बौद्धिक योद्धाओं से गौरवान्वित हुयी हो वहीं महादेव गोविन्द रानडे और तर्कतीर्थ जोशी जैसे अध्येताओं के परिश्रम के कारण जहाँ बहस का स्तर सदा भारत के अन्य सभी प्रान्तों से उच्चतर रहा हो.

मुगलों के खिलाफ कभी मावलों ने यहीं गनिमी कावा नामक अपनी छापामार शैली को जन्म दिया था, जिसका उद्देश्य कम से कम नुकसान में दुश्मन को ज्यादा से ज्यादा सताना था. उनके भी आन्दोलन का मूल अस्त्र, उनकी छापामार शैली अर्थात ‘गनिमी कावा’  शिवाजी के लगभग ३०० साल बाद मराठी भाषा के पत्रकारों का सबसे पंसदीदा शब्द बन चुका था. १९८४ में इंदिराजी की मौत के बाद हुए संसदीय चुनाव में जब पूरे देश में कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल रही थी, महाराष्ट्र में कांग्रेस के मंत्रियों को गांव गांव में प्रश्न पूछे जा रहे थे और उनकी सभायें उध्वस्त की जा रही थी.   १९९१ में जब राजीव गाँधी की मौत के बाद कांग्रेस के पक्ष में फिर सहानुभूति लहर निर्मित करने की कोशिशे चल रही थी,  हमारे यहाँ वसंत साठे जैसे दिग्गज चुनाव हार रहे थे.  

पांच रूपये की टोपी मस्तक पर धारण करने वाले गरीब किसानों को उन्होंने नेहरु प्रणित अर्थव्यवस्था में होनेवाली लूट का जो अर्थशास्त्र समझाया था, उसने कांग्रेस की देहातों में चूलें हिला दी थी. जो जनता कभी गाँधी नेहरु परिवार के सामने लोटांगण किया करती थी, आज उसके सिपहसालारों से खुले आम प्रश्न पूछ रही थी.  तब तक महाराष्ट्र में अपराजेय माने जाने वाले शक्कर सम्राट और सहकार महर्षि उनके इस जनांदोलनों के सबसे बड़े शिकार होने लगे थे. इस अर्थ में जिस काम को राममनोहर लोहिया की लाजवाब प्रतिभा ने कभी विंध्याचल के उत्तरी राज्यों में अंजाम दिया था, उसी को शरद जोशी नब्बे के दशक में महाराष्ट्र में अंजाम दे रहे थे.  

कांग्रेस को देश की तमाम समस्याओं की जड़ मानने वाले ये ही शरद जोशी राजनीती में बड़ते धर्म और जाति के असर से भी लड़ने चल पड़े और उन पर कांग्रेस को समर्थन देने के आरोप भी लगे किन्तु वोट का गणित बिठाना उनकी तासीर में ही नहीं था. नफे-नुकसान का हिसाब तो बनिया करता है, ज्ञान मार्ग को समर्पित यह त्यागी ऋषि क्या लाया था जो खोने के उसे डर होता? १९९१ में जब नरसिम्हा राव के नेतृत्व में देश में आर्थिक सुधारों की आंधी चली, वे पहले नेता थे जो उनके समर्थन में आगे आये. जब कांग्रेस के अपने ही नेता आर्थिक सुधारों को समझने में असमर्थ थे और दूसरों को समझाने में तो और भी असमर्थ थे, शरद जोशी ने महाराष्ट्र के अनपढ़ किसानों को उसके फायदे समझा दिए थे. अर्थशास्त्र के मूलभुत सिद्धांतों को सरलतम भाषा में सामान्य से सामान्य व्यक्ति को समझाने में तो मानो उन्हें विशेष प्रावीण्य हासिल था. इस अर्थ में ज्योतिबा के बाद उनके जैसा लोक-शिक्षक शायद ही महाराष्ट्र ने पैदा किया हो. आज गौरव से महाराष्ट्र कहता है कि यदि शेतकरी संघठन का लाल बिल्ला सीने पर लगाया एक भी कार्यकर्ता भीड़ में बैठा हो तो अच्छे अच्छे अर्थशास्त्री बिना सोचे विचारे कुछ भी बोलने से घबराते है. वह अदना सा कार्यकर्ता बड़े से बड़े विशेषज्ञ का अपने तर्कों से मुँह बंद करने का माद्दा रखता है.

स्वयं रोजगार और उद्यमशीलता के प्रति शरद जोशी के झुकाव ने उन्हें सदा आरक्षण और सबसिडी वाली अर्थव्यवस्था का दुश्मन बनाये रखा. मनुष्य के अदम्य साहस और जिजीविषा में उनका गहरा विश्वास था. मनुष्य के भीतर उच्च आदर्शो के प्रति उठनेवाली पुकार को लेकर वे निसंदिग्ध थे. यही कारण है कि वे किसी भी सामंत, शासक, पहरेदार और अधिकारी को यह अधिकार देने को तैयार नही थे कि वह दूसरों को समझाए कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा. “सरकार समस्या क्या सुलझाए, सरकार यही समस्या है उनका यह नारा आज जितना महाराष्ट्र में गूँजता है, उतना शायद ही देश के किसी अन्य राज्य में गूँजता है. यही सोच की विभिन्नता उन्हें अन्ना हजारे जैसों से दूर ले जाती थी, जो सख्त से सख्त लोकपाल की बात कर रहे थे. शरद जोशी पारदर्शकता, प्रतियोगिता और परस्पर निर्भरता को मानवीय प्रगति और उत्थान का मुख्य कारक मानते रहे, सरकार, कानून और स्वावलंबन को नहीं. यही कारण है कि स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का विचार उन्हें रुग्ण और खर्चीला लगता रहा. यह विचार अस्मिता तो पैदा कर सकता है, प्रतिभा नहीं. इससे कुछ दिनों के लिए आपका मेरा खून गर्म हो सकता है किन्तु मानवीय सभ्यता इससे इतिहास के प्रत्येक कालखंड में जख्मी और लहुलुहान ही हुयी है.

शायद इसी कारण जिन विश्वनाथ प्रताप सिंह को समर्थन देने के लिए उन्होंने सारे महाराष्ट्र के हर गली कूचे की खाक छानी थी, उनके द्वारा जातीय राजनीति का आगाज किये जाने पर उन्हें त्यागने के लिए उन्हें दो मिनट का भी वक्त नहीं लगा था. विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा की गयी उस गद्दारी की चुभन अंत तक उनके कलेजे में टीस पैदा करती रही. उन्होंने जैसे देश की दूसरी आजादी की उम्मीदों पर कालिख पोती थी. 

अपने ऐसे ही बेजोड़ विचारों के कारण अक्सर उन्हें हाशिये पर धकेलने की कोशिशे की गयी. किन्तु वक्त उन्हें बार बार अपने बीच बुलाता रहा. मेरा मत है कि दुनिया के हर एक मौलिक चिंतक और विचारक की तरह वे अपने समय से सदा आगे रहे और इसलिए उनके हिस्से में सदा मंथन से निकला विष आया, जो उन्हें कंठ में धारण भी करना था और अपने आदर्शो को बचाए भी रखना था.  इस अर्थ में वे हमारे दौर के “एक कंठ विषपायी’ नीलकंठ थे. वे अपने इस जीवन संघर्ष में कितने सफल रहे, कितने असफल, इसका फैसला तो भविष्य करेगा ही किन्तु मुझ जैसे अनगिनत कार्यकर्ताओं के जीवन में जो अलख उन्होंने जगा दी है, उस धरोहर से हम सदा के लिए समृद्ध रहेंगें.

बाहर से बेहद सख्त दिखने वाले शरद जोशी भीतर से एक बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे. अपनी पत्नी की मृत्यु के लगभग बीस साल बाद एक दोपहर वे हमारे साथ एक कार में बैठकर अमरावती जिले की चांदुर तालुका का वह स्थान खोजते रहें जहाँ कभी उन्होंने अपनी पत्नी के साथ किसी दोपहर में चाय पी थी. किंतु बीस वर्षों के अंतराल में सड़क चौड़ीकरण में शायद वह झोपड़ी हटाई जा चुकी थी. हमें उस दोपहर निराश लौटना पड़ा. अपने आदर्शो के सख्त रास्ते पर चलने की जिद में १९८३ में ही जीवनसंगिनी को गँवा देने का दुःख उन्हें अंतिम समय में बेचैन करता रहा. नतीजतन वे अपने जीवन के अंतिम दशक में कुछ-कुछ धार्मिक से होने लगे थे. यही बेचैनी और जीवन के शाश्वत उद्देश्य और नियति की खोज उन्हें २००२ में नर्मदा की गोद में ले गयी. नर्मदा की इस आध्यात्मिक यात्रा ने उन्हें कितना संतुष्ट किया, यह तो उन्ही को पता, किंतु इसने उन्हें जिंदगी का एक और दशक जीने की शक्ति अवश्य दे दी थी. वे अपने अंतिम क्षण तक इस पुनीत पावन सलिला के प्रेम में पड़े रहें.

वे एक किशोर की तरह जिंदगी से प्यार करते थे इसलिए नयी पीढ़ी के साथ सामंजस्य बिठाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती थी. मेरे हाथ में हर बार कोई न कोई नई किताब देखने पर एक दिन उन्होंने कहा था, “जवान आदमी हो,  जिंदगी का सत्य अपने आसपास की दुनिया में खोजो, किताबों में नहीं.” उस के बाद किताबों पर मेरी निर्भरता कम होने लगी और जिंदगी से मेरी मुहब्बत बढ़ने लगी थी.
आज मैं अपनी जिंदगी से बेहद खुश हूँ.

जोशी साहब ! आपके साथ बिताए प्रत्येक क्षण के लिए.., आपके साथ चले हर एक कदम के लिए ...मैं आनंद से विभोर होकर उस ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ जिसने आपके समय और अंतराल में मुझे जन्म लेने का सौभाग्य दिया है.  मुझे जन्म मेरे माँ पिता ने दिया था किंतु एक गुरु की तरह आपने मुझे द्विज होने का सम्मान दिया है.

आपकी महान आत्मा को मेरी श्रद्धांजलि.. आपके जन्मदिन पर लिखा मेरा गीत आज आप अवश्य सुनेंगें, यही प्रार्थना है:

जिस कारवाँ में तुम जा रहे हो


जिस कारवाँ  में तुम जा रहे हो, उस कारवाँ में हमें साथ लेना
जब जिंदगी की कहानी कहोंगे, हम भी सुनेंगे हमें साथ लेना

ये राहें ये जंगल नदी के किनारें, युगों के सफर पर चले चाँद तारें
ये पर्वत को धोते बादल घनेरे, ये शामों को झीलों पे चलते शिकारें
इन्हें देखने तुम रूकोगे जहाँ पर हमें भी बुलाना हमें साथ लेना
जब जिंदगी की कहानी कहोंगे, हम भी सुनेंगे हमें साथ लेना

ये रंगों, ये रागों, ये खुशबू के मेले , हो अपनों की यादों में गुमसुम अकेले
वे भीगी हुयी मुस्कराती निगाहें,  वे आँचल में माँ के छिपे पल सुनहरें
जो तुम डूब जाओ इनके किनारें, हमें भी भिगाना हमें साथ लेना
जब जिंदगी की कहानी कहोंगे,  हम भी सुनेंगे हमें साथ लेना

ये तीर्थों पे अंकित प्रभु पद कथाएँ  ये आँखों से बहती परम आस्थाएँ
ये भक्ति के आँगन, श्रद्धा के पूजन, ये शक्ति के आगे समर्पित दिशाएँ
इस पुण्यधारा में जब तुम बहोगे,  हमें भी बहाना हमें साथ लेना
जब जिंदगी की कहानी कहोंगे,  हम भी सुनेंगे हमें साथ लेना

दिनेश शर्मा, पुलगांव
९१३०३२७६६४  






Monday, September 21, 2015

वामपंथी लिबरल और सनातन संस्था




वामपंथी लिबरल और सनातन संस्था
एड. दिनेश शर्मा  
९१३०३२७६६४

जब से सनातन भारत संस्था से जुड़ा समीर गायकवाड़ नामक कार्यकर्ता कामरेड गोविन्द पानसरे हत्या प्रकरण में पुलिस की गिरफ्त में आया है, टीवी की बहस में तमाम वामपंथी लिबरल प्रवक्ता इस संस्था पर बंदी लगाने की मांग कर रहे हैं. अभी तक इस संस्था की कामरेड गोविन्द पानसरे हत्या या महाराष्ट्र के प्रसिद्द विचारक श्री दाभोलकर की हत्या में  भागीदारी साबित नहीं हुयी है, किंतु भाजपा का शासन हो और हत्यारा कथित हिन्दुवादी विचारधारा से ताल्लुक रखता हो तो वामपंथियों की बल्ले बल्ले होना स्वाभाविक ही है. महाराष्ट्र में सभी टीवी चैनल्स की बहस में एक बेहद आश्चर्यजनक सच्चाई सामने आती दिखाई देती है, वह है कथित समाजवादियों और वामपंथियों के प्रति उदारताभरा सम्मान और कथित दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रति अतिशयोक्तिपूर्ण तिरस्कार.

वास्तव में महाराष्ट्र देश का एक ऐसा प्रदेश है जहाँ धर्मनिरपेक्ष राजनीति कभी भी इस हालात में नहीं रही कि वह दक्षिणपंथी राजनीति को चुनौती दे सके. समूचे प्रदेश में जो भी गिने चुने अल्पसंख्यक या दलित नेता है, उनकी अपनी कोई जमीन या तगड़ा वोट बैंक नहीं है, और वे सारे अपने अस्तित्व के लिए काँग्रेस या राष्ट्रवादी काँग्रेस की मेहरबानी पर ही राजनीति करते आये है. महाराष्ट्र में हिंदुत्ववादी राजनीति का असली मुकाबला कथित रूप से कांग्रेसी और समाजवादी विचारधारा से है. महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेता भी देश के बाकी प्रदेश के नेताओं की तरह केवल गाँधी परिवार की जयजयकार नहीं करते बल्कि सबके अपने महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और सहकारी कारखानों के साम्राज्य है. वे विलासितापूर्ण जीवन जीने के मामले में किसी भी अंबानी या विजय मलाया को शर्मिंदा कर सकते है. उनके पास इतना पैसा है कि भाजपा और शिवसेना वाले भी उनको चारा डालते रहते है. अत: गाँधी परिवार को उनकी जरूरत है, उन्हें उसकी नहीं.

राज्य में जितने समाजवादी, वामपंथी या दलित विचारक है या तो वें स्वयं या उनके घर का कोई प्रमुख सदस्य इन कांग्रेसी या राष्ट्रवादी काँग्रेस के नेताओं के सहकारी कारखानों या शिक्षा संस्थानों में नौकरी पर है. अत: वे भी अपने हमलों की धार आम तौर पर काँग्रेस और राष्ट्रवादी के नेताओं के सामंती जीवन के प्रति सौम्य ही रखते हैं. काँग्रेस और राष्ट्रवादी के ये तमाम नेता मराठा अस्मिता के मुख्य प्रवर्तक महान छत्रपति शिवाजी को अपना आराध्य मानते है, महात्मा गाँधी को नहीं. कभी इसी प्रदेश से काँग्रेस में गरम दल का प्रतिनिधित्व करने वाले लोकमान्य तिलक का जन्म हुआ था, जिन्हें आज भी लोग आधुनिक भारत का पहला लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता मानते है. स्वातंत्र्य वीर सावरकर के प्रति लोग दलगत मतभेदों से उपर उठकर सम्मान रखते हैं. स्थानिकों की अस्मिता को सभी दल खाद-पानी डालते रहते है. शिवसेना का सहारा लेकर काँग्रेसी पहले ही वामपंथ को तडीपार कर चुकी है.

इसप्रकार मूल रूप से यहाँ की काँग्रेस और राष्ट्रवादी की राजनीति भी दक्षिणपंथी ही है, राहुल गाँधी या सोनिया गाँधी के सपनों की तरह वामपंथी नहीं. अत: महाराष्ट्र में सरकार किसी भी पार्टी की हो, वास्तव में सत्ता में दक्षिणपंथ ही हावी रहता है और अल्पसंख्यकों या वामपंथियों के लिए राजनीति में हाशिए पर भी कोई जगह शेष नहीं है. अब इन कथित वामपंथी लिब्रल्स के लिए जमीन पर तो कोई काम बचा नहीं है, तो वे अपने आपको व्यस्त रखने के लिए हिन्दुवादी समूहों से भिड़ते रहते हैं और चर्चा में बने रहते हैं. कभी अंधश्रद्धा हटाने के नाम पर तो कभी किसानों के लिए पानी की कमी के नाम पर कुम्भ मेले पर बंदी लगाने को लेकर, वामपंथी लिब्रल्स का सारा जोर हिन्दुवादी संघठनों से पंगा लेने में लगा रहता है क्योंकि कांग्रेसी इनके जीवनयापन की व्यवस्था करते रहते हैं.

आज तक महाराष्ट्र में किसी भी समाजवादी या वामपंथी नेता ने कांग्रेसियों और राष्ट्रवादी के नेताओं से राज्य की तबाही पर कोई सार्थक प्रश्न नहीं पूछा  है, उनके शिक्षा संस्थानों में शिक्षा के बदतर स्तर और भ्रष्टाचार पर कभी किसी ने हाईकोर्ट में कोई याचिका दाखल नहीं की है और ना ही किसानों की आत्महत्या पर उन्होंने कभी किसी वैचारिक बहस को जन्म दिया है.  महाराष्ट्र के समाजवादी विचारकों ने काफ़ी पहले अपना जमीर और आंदोलन कौशल्य काँग्रेस के सहकार सम्राटों के दरबारों में मानो गिरवी रख दिया था. इसीलिए राज्य को अपना पहला काँग्रेस विरोधी जनआंदोलन शुरू करने के लिए भी अस्सी के दशक तक इंतजार करना पड़ा जब स्विजरलैंड से आये भारतीय विदेश सेवा के एक बुद्धिमान अधिकारी श्री शरद जोशी ने अपने किसान आंदोलन, शेतकरी संघठन के माध्यम से कृषी के शोषण पर अपनी आँकड़ेवारी पेश करके उनकी सत्ता की चूलें हिला दी थी.

ये तमाम वामपंथी लिब्रल्स नक्सलवादी हिंसा को प्रोत्साहित करने के जुर्म में पकड़े गए जेएनयू के प्राध्यापकों की गिरफ़्तारी के समय मानव अधिकारों की बातें करते हैं, अमेरिका और इराक के युद्ध में जार्ज बुश को कोसते हैं, कश्मीर में मानव अधिकारों के हनन पर घड़ियाली आँसू बहाते हैं और किसी हिन्दुवादी अदने से कार्यकर्ता के दो कौड़ी के बयान पर घंटों चर्चा की सामग्री जुटा लेते है. भाजपा सांसद सुश्री निरंजन ज्योति, योगी आदित्यनाथ. साक्षी महाराज और साध्वी प्राची जैसे बयान बहादुर उन्हें जीने और अपने अस्तित्व का अहसास दिलाने का समान जुटा देते हैं.

जब से राज्य में देवेन्द्र फडनवीस और केन्द्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आयी है, उनके जीवन में मानो वसंत आया हुआ है. उनके कृतिशून्य और परावलम्बी जीवन के इस संध्याकाल में हर चैनल उनके विचारों को ऐसे पेश कर रहा है मानो ये कल के मुक्त, उन्नत और समृद्ध महाराष्ट्र का कोई सपना दे रहें हो. जबकि उनके अपने जीवन विचारों की दरिद्रता, वामपंथी अधिनायकवाद और तकनीक के मामले में पूरी तरह प्रतिगामी है. महाराष्ट्र को पहले भी उनसे केवल निराशा हाथ लगी है, अब तो वैसे भी दुनिया काफ़ी बदल चुकी है. कृतिवीर महान छत्रपति और भारतीय असंतोष के जनक लोकमान्य का महाराष्ट्र इनसे प्रेरणा भी ले तो किस बात की..

अत: जिस संस्था पर आज तक कांग्रेसी राज्य और केन्द्र में दशकों तक सत्ता होने के बावजूद पाबंदी नहीं लगा सके, उस हिन्दुवादी संघठन पर ये मोदी सरकार से पाबंदी लगाने की मांग कर रहें हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस दौर में जब फेसबुक, ट्विटर और तकनीक के नये नये माध्यम किसी भी पाबंदी को नाकारा साबित कर सकते है, ये एक संस्था पर केवल इसलिए पाबंदी की मांग कर रहें हैं क्योंकि इनकी अपनी अभिव्यक्ति पर कोई प्रश्न नहीं खड़ा कर सके..ये उसे बहस से हराना नहीं चाहते, बस सरकारी डंडे या कानून से मौन करना चाहते है..  
अत: सनातन भारत संस्था के अधिकांश विचारों से असहमत होते हुए भी मैं उसकी अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करता हूँ. मैं उनके हाथों से पिस्तौल या तलवार तो छीन सकता हूँ,  कलम नहीं.  कभी फ़्रांस के महान विचारक वाल्तेयर ने कहा था:-

 I do not agree with what you have to say, but I'll defend to the death your right to say it.

  एड. दिनेश शर्मा

Thursday, September 10, 2015

हिंदु अस्मिता और जैन शाकाहार


हिंदु अस्मिता और जैन शाकाहार

भगवान महावीर के अनुयायी जैन धर्मियों का पर्युषण पर्व सृष्टि  के कण कण में व्याप्त अनादि अनंत जीवन की धडकनों के प्रति मनुष्य द्वारा अभिव्यक्त आभार प्रदर्शन का एक पर्व है. यह जाने-अनजाने जीवन की हर एक अभिव्यक्ति के प्रति मन, वचन और कर्म से की गयी हिंसा के लिए क्षमायाचना का एक बेमिसाल अवसर माना जाता है. इन दिनों में जैनबंधु समूचे वर्ष भर में किये अपने जाने-अनजाने गुनाहों की क्षमा माँगते है, और एक दूसरे के साथ अपने संबंधों की नई पारी शुरू करते है.

मूलत: भारत के पश्चिमी प्रान्तों में रहने और कारोबार करनेवाला यह अल्पसंख्यक समूह पारसियों और सिखों की ही तरह देश के समग्र आर्थिक विकास में अपनी जनसंख्या के अनुपात में काफ़ी बड़ा योगदान करता है. इस समूह के मंदिर, स्कूल, छात्रालय, धर्मादा दवाखाने और सामाजिक भवन तुलना में गरीब विशाल हिंदु समाज के लिए एक बेहद अहम सहारा है, जो युगों युगों से जारी है.  साक्षरता की दृष्टी से भी यह भारत का सबसे पढ़ा लिखा समाज है, जहाँ आज की घड़ी में साक्षरता-दर, पुरुष और महिला, दोनों में ९८% प्रतिशत के आसपास है. एक अल्पसंख्यक समूह के रूप में इसने देश से शायद ही कभी कुछ माँगा हो. उलटे राष्ट्र निर्माण में इनका प्रति-व्यक्ति योगदान अपनी संख्या से कई गुना ज्यादा का ही है. अपनी कर्मशील प्रतिभा और समावेशी व्यवहार के कारण राजनीति और प्रशासन में भी इनका प्रतिनिधित्व अपनी जनसँख्या के अनुपात में शायद ही कभी कम रहा हो. देश के सर्वोच्च न्यायालय के कई दिग्गज न्यायाधीशों में जैन और पारसी न्यायाधीश अलग से उठकर दिखाई देते रहे हैं. भले ही सेना में उनका योगदान नगण्य रहा हो, किंतु अपने उद्योगों से जो समृद्धि उन्होंने पैदा की है, उससे सेना के लिए हथियार तो ख़रीदे जा ही सकते है.  

जैन विश्व के किसी भी कोने में हो, अपनी मौजूदगी से अपने वातावरण को समृद्ध और साफसुथरा ही बनाते है. इसके धर्मगुरु  समस्त हिंदुओं के लिए मार्गदर्शक और प्रेरणादायी ही नहीं माने जाते बल्कि उनमें से कई तो हिंदु परिवारों में जन्मे हैं. उनकी किताबें और सीडीज हिंदुबांधव भी खरीद कर अपने व्यवहार को और अधिक पारिवारिक और सामाजिक बनाने की कोशिश करते हैं. जहाँ कई कथित हिंदु साधु सन्यासी अपनी अय्याश और दिखावटी जीवन शैली के कारण हमारे मन में जुगुप्सा पैदा करते है, वहीं जैन संतों का जीवन अनगिनत भौतिक सुखों के इस दौर में भी समाज के एक बड़े हिस्से के लिए ना केवल अनुकरणीय  रहा है बल्कि उसकी त्याग और तपस्या से अनुप्राणित धार्मिक प्यास को भी बुझाता रहा है.

इतिहास के पन्ने गवाह है कि हिंदुओं ने यदि अहिंसा और शाकाहार को अपनी धार्मिक सोच का अभिन्न अंग बनाया है तो उसका सारा श्रेय बुद्ध से भी ज्यादा इन जैनों को जाता है. आज आपको अधिकांश वैष्णवों के खानपान और जैनों के खानपान में राई-रत्ती का भी अंतर नहीं मिलेगा. महात्मा गाँधी का सबसे प्रसिद्ध भजन, “वैष्णव जन तो तेने कहिये” वास्तव में इसी जैन और हिंदु वैष्णव अहिंसक जीवन परंपरा का उद्घोष मात्र है. महाभारत के शांति पर्व में अहिंसा और शाकाहार के पक्ष में जो आख्यान आये हैं, वे सदियों से हिंदु मानस का अविभाज्य अंग रहे हैं. शायद इसी कारण अधिकांश अस्त्र-शस्त्र धारी हिंदु देवी देवताओं को भी प्रसाद केवल फल फूल का ही चढ़ाया जाता रहा है. मेरी स्मृतियों में आज भी विधानसभा के तीन दशक पुराने इतिहास के वे पन्ने ताजा है, जब इन हिंदु देवी देवताओं को माँसाहारी बताने वाले काँग्रेस के वर्धा के तत्कालीन विधायक मानिकराव सबाने पर विधानसभा में स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना और भाजपा के सभी विधायक टूट पड़े थे. आज मानिकराव सबाने जीवित नहीं है, किंतु उन पर हमला करनेवाले भाजपा के तत्कालीन विधायक अरुण अडसड आज भी राज्य की राजनीति में सक्रिय है.  

आज उन्ही जैनों के अपने पर्युषण पर्व में शाकाहार के प्रति आग्रह ने शिवसेना की हिंदु अस्मिता को जख्मी कर दिया है. जख्मी भी इतना कि शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे को उन्हें अपने समाचार पत्र में एक लंबा चौड़ा संपादकीय लिख कर चोर, दलाल और दो नंबरी जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए धमकाना पड़ा है. जैनों से पूछा गया है कि क्या वे पर्युषण पर्व में अपने दो नंबर के व्यापार या काली कमाई  बंद कर देते है? और तो और उद्धव ने उन्हें १९९३ के दंगों की याद तक दिला दी, जिसमें मुस्लिमों के कथित हमलों से बालासाहेब की शिवसेना ने ही उन्हें बचाया था. आगे यह संपादकीय उन्हें धमकाता है कि उनके सारे कारोबार को बंद करने में शिवसेना को अधिक समय नहीं लगेगा.

१९९३ के दंगों के बारे में उद्धव शायद यह भूल गए है कि मुस्लिमों का आक्रोश रामजन्मभूमि विवाद के चलते हिंदुओ के ही विरुद्ध था, जैन तो बेचारे मुफ़्त में उस आक्रोश में पिसे जाने वाले थे क्योंकि वे हिंदुओं के साथ उठते-बैठते उनके जैसे ही लगते है.  अन्यथा जैनों की मुस्लिमों से दुश्मनी क्या थी? यदि सारी दुनिया जैनों को हिंदु समझती है और हिंदुओं के साथ अपने कथित संघर्ष में उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाती है तो इसमें जैनों का दोष क्या है? क्या उन्होंने हिंदुओं जैसे अपने रहन सहन को बदलकर यह घोषणा कर देनी चाहिए कि हमारा हिंदुओं से कोई लेना देना नहीं है? क्या ऐसी किसी घोषणा को उद्धव पचा पायेंगे?

उद्धव ठाकरे का जैनों के व्यापारिक कौशल्य पर ऊँगली उठाना क्या साबित करता है? क्या हिंदु उद्यमियों को भी उद्धव पूछना चाहेंगे कि वे दीवाली, दशहरे और रक्षा बंधन पर दो नंबर की कमाई लेना बंद कर दें? जैनों के व्यापार को उद्धव ने उनके धर्म से जोड़कर हमला किया है. क्या हिंदु साधु संतों के अश्लील और दिखावटी व्यवहार पर हिंदु अस्मिता के एकमेव रक्षक के रूप में उद्धव उन्हें कोई सलाह देना नहीं चाहेंगें? आज तक सामना के किसी भी संपादकीय में आसाराम बापू हो, नित्यानंद हो या राधे माँ, किसी पर कोई हमला नहीं किया गया है. क्या उद्धव अपनी हिंदु अस्मिता की रक्षा के लिए उन्हें खुला छोड़ देना चाहते है? अपने दादा प्रबोधनकार की तरह उनकी असली हिम्मत की परीक्षा तो तब होती जब वे हिंदु हितों की बात करते हुए कभी हिंदुओं की इन कमजोर नसों का भी जिक्र करते, ना कि एक बेहद छोटे से समाज विशेष के प्रति अपने कार्यकर्ताओं को उकसाते.  

किंतु यूँ लगता है कि उद्धव गत विधानसभा चुनाव में अपनी करारी हार के सदमें से अभी तक नहीं उबर पाए है. भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह जैन है, इसलिए अपने जीवन में पहली बार शिवसेना आज जैनों के आमने सामने है. कभी शिवसेना ने दक्षिण भारतीयों को नाराज किया था, फिर हिंदी भाषियों को और अब गुजराती और जैन उसके निशाने पर है. उनके पिता बालासाहेब बड़े दिल के थे इसलिए लोग उनकी बातों का बुरा नहीं मानते थे. वे सभी के दोस्त थे और कोई भी अपनी मुसीबत में मातोश्री का दरवाजा खटखटा सकता था. उनके निष्पक्ष, उदार किंतु साहसी व्यवहार से मराठी अस्मिता को शक्ति मिलती थी. उनकी भाषा दिल से निकलकर दिल को छूती थी, इसलिए उनके दुश्मन भी उन्हें टिकाये रखना चाहते थे.  समूचे हिन्दुस्थान में बालासाहेब को लोग चाहते थे, भले ही उनकी पार्टी, उनकी विचारधारा अलग रही हो. इसलिए वे अपने जीवनकाल में ही एक मिथक बन गए थे. उद्धव से तो उनके अपने करीबी भी मिल नहीं पाते है. उन्होंने राजनीति में केवल दुश्मन ही निर्मित किये है. अपनी पार्टी के बड़े बुजुर्गों को उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपमानित करवाया है. जो उन्हें छोड़कर गए, वे वापस आना नहीं चाहते. नतीजतन उद्धव का आज कोई मित्र नहीं है.

उद्धव यदि थोड़ा भी जैन धर्म और उसकी बुनियादी मान्यताओं को जानते, समझते और अमल में लाते तो शायद इस पर्युषण पर्व पर अपने व्यवहार से दुखी समस्त पुराने मित्रों  को पत्र लिखकर क्षमायाचना कर लेते और राजनीति में अपने मित्रों की संख्या बढ़ाते.  दुर्भाग्य से क्षमायाचना के इस महान पर्व पर भी उन्होंने अपने मित्र कम, विरोधी ही अधिक बढ़ाये हैं.

जैनों की संख्या कम है, अत: वे राजनीति में वोटों की दृष्टी से किसी का भी खेल खराब करने की ताकत शायद नहीं रखते हो. किंतु हिंदु दर्शन में भी छोटा कहाँ अक्सर छोटा माना जाता है. हिंदु अस्मिता के प्रेरणा पुरुष मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम तो रामेश्वरम और धनुषकोटि के बीच खड़े किये जानेवाले सेतुसमुद्रम के लिए एक गिलहरी के भी सहयोग को इतनी गरिमा से स्वीकृति देते है कि यह गाथा हमारे मिथकीय आख्यानों में स्वर्णाक्षरों से लिखी जा चुकी है. क्या उद्धव अपने सेतुबंध के लिए इन गिलहरियों का सहयोग लेना नहीं चाहेंगें?


दिनेश शर्मा

Tuesday, September 1, 2015

महिला प्रश्न और शरद जोशी



महिला प्रश्न और शरद जोशी

शेतकरी संघठन के प्रणेता शरद जोशी दिनांक ३ सितंबर को अपनी जिंदगी के आठ दशक पूरे कर रहे हैं. आपातकाल के संक्रमणकाल के बाद जब देश में क्रांति और बदलाव के नाम पर कई अजूबे जन्म ले रहे थे, महाराष्ट्र की प्रतिभा संपन्न भूमी ने अपने स्तर पर किसानों के जीवन की चिरस्थायी त्रासदी का हल खोजने की कोशिश की थी. डेढ़ शताब्दी पहले यही प्रयास ज्योतिबा फुले भी कर चुके थे. उलट पुलट का यह वह दौर था, जब वामपंथ की असफलता क्षितिज पर दिखाई देने लगी थी, समाजवादी राजनीती अपने-अपने जन्म स्थानों पर मजबूत जातियों का आश्रय खोज रही थी और हिन्दूवादी राजनीती का जन्म होना बाकी था. उस नितांत प्रेरणाहीन दौर में शरद जोशी उठे और उनके साथ उठा था सीधेसाधे मराठी मानूस के भीतर का वैश्विक कालपुरुष.

शरद जोशी ने नारेबाजी नहीं की, वे दूसरों के विचारों की फंतासी में नहीं भटके. उन्होंने पूना के अम्बेठान में स्वयं खेती की, खेती में मजदूरी करने वाले मजदूरों और उनकी महिलाओं के साथ खेती के प्रत्यक्ष अनुभव साझा किये और अपने उन्ही अनुभवों की शिदोरी साथ में लेकर जब वे अपनी उपज को बाजार में बेचने आये, एक क्रूर सत्य से उनका साक्षात्कार हुआ. सत्य यही था कि नेहरूवादी विकास माडेल में किसानों का शोषण कोई हादसा नहीं, एक सोची समझी सरकारी योजना का हिस्सा है. इस अनुभव से यह सत्य भी उद्घाटित हुआ कि सरकारें महज एक अनिवार्य बुराई मात्र है, वे समाज को ना तो बदल सकती है ना ही सुधार सकती है. अत: वे जितना कम या सीमित हो उतना मानवीय प्रतिभा अपने अंतहीन सपनों की यात्रा पर निकल सकती है.  जहाँ जहाँ सरकारे मजबूत होगी, वहाँ वहाँ का समाज उतना दरिद्र होगा. शरद जोशी ने यह सत्य उस समय उद्घाटित किया था जब सोव्हियत रूस का पतन होना बाकी था और चीन के भीतर की भयानक खबरें अभी बाहर आयी नहीं थी.

इन्हीं प्रत्यक्ष अनुभवों ने शरद जोशी के स्त्री संबंधी विचारों को भी घड़ा था. जब बीजिंग में वैश्विक महिला सम्मेलन हो रहा था और पूर्व से पश्चिम तक समूचे विश्व में नारी मुक्ति के उग्र नारों का शोर सुनाई दे रहा था, शरद जोशी ने महाराष्ट्र में बीजिंग विरोधी महिला परिषद का आयोजन किया. उन्होंने पहली बार किसानों और उद्यमियों की महिलायें क्या सोचती है, इस सत्य को दुनिया के सामने रखा. शरद जोशी के चिंतन की महिलायें पुरुषों से मुक्त नहीं होना चाहती थी, वे उत्पादन की प्रक्रिया में अपनी मेहनत का सम्मान चाहती थी. उसका सपना आजादी का नहीं, बल्कि पुरुष के जीवन में गरिमापूर्ण उपस्थिति का था. उनके चिंतन की महिला के लिए उसकी प्रेरणा के बिना उसका पुरुष और अपने पुरुष के उद्यम के बिना वह स्वयं अधूरी थी. वे दोनों एक दूसरे को पूर्ण करनेवाली ताकतें थी, और इसलिए उन्हें एक दूसरे के साथ में रहने का तरीका समझना ही पड़ेगा और साथ साथ एक दूसरे की उन्नति का साधन बनना होगा.  

शरद जोशी के चिंतन की नारी अपनी कथित आजादी के नाम पर मनुष्यता ने अपनी सृजनात्मकता से जो कुछ भी आज तक अर्जित किया है उसे दांव पर लगाना नहीं चाहती बल्कि अपने परिवार में ही रहकर एक नैतिक जीवन जीते हुए भावी पीढ़ी का निर्माण करना चाहती है. उसके लिए पति और ससुरालवालें असली दुश्मन नहीं थे बल्कि शराब के अड्डे चलानेवाले, लॉटरी और मटके की दुकान चलानेवाले और महिलाओं का अश्लील निरूपण करके मनुष्य की प्रतिभा को तबाह करने वाले लोग  असली दुश्मन थे. इसलिए शरद जोशी के चिंतन की महिला अपने पतियों के खिलाफ उग्र नारे लगाती बाहर नहीं निकली बल्कि उसने शराब के अड्डों पर धरने दिए और सरकार को उन्हें बंद करने के लिए मजबूर किया. उनके चिंतन की महिला पुराणों की सावित्री की तरह अपने पति को यमराज के भी चंगुल से निकालने का इरादा रखती थी, उसे त्यागकर अपने लिए कोई नया स्वर्ग निर्मित नहीं करना चाहती थी.

वह जानती है कि “भारत के उपर इंडिया के हमले” में उसका पति भी घायल है, टूटा हुआ, परास्त और हतबल है. वह देख रही थी कि शहर की भाषा, शहर के कानून और शहर के सरकारी कारकून किस तरह उसके पति के श्रम की कौड़ी मोल बोलियाँ लगाते है और किसतरह उसे बेवकूफ साबित करने पर तुले है. इसीलिए गाँव की वह महिला इंडिया के बनाये कानूनों से उतनी ही दुखी और शोषित है, जितनी कि उसके परिवार के अन्य लोग. उसके लिए सरकार, पुलिस और अदालतें शोषण से मुक्ति देनेवाले तारणहार ना होकर पति के साथ उसके भी साझा दुश्मन है क्योंकि ये तबके उन दोनों की मेहनत से उपजे उत्पादन पर डाका डालने वाले सरकारी मान्यताप्राप्त दस्यु गिरोह मात्र हैं.  समस्त कानूनों के प्रति शरद जोशी की सोच का अंतर्भूत तिरस्कार उन्हें हिंद स्वराज्य से झलकते गाँधी के करीब-करीब लेकर जाता है. कभी डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने काँग्रेस से यही प्रश्न किया था, “कैसी सरकार और कौनसी आजादी? यदि आपकी कथित आजादी के बाद उच्च वर्ग शोषक और दलित वर्ग शोषित ही रहनेवाला हो, तो हम क्यों तुम्हारे स्वतंत्रता समर में शामिल हो? हम तो तुम्हारी आजादी के बाद लुटने ही वाले है, तुमसे बेहतर तो ये अंग्रेज है, जो कम से कम हमें सुरक्षा तो दे रहे है.”   

ठीक यही प्रश्न शरद जोशी ने नेहरू और इंदिरा गाँधी प्रणित काँग्रेस से किया और अपने लाजबाव आँकड़ों से यह साबित कर दिया कि नेहरु की शहर समर्थक और उद्योगों को पोषित करनेवाली राजनीति में ही उजड़ते और जर्जर होते ग्रामीण भारत का अपराधी छिपा था. फिर उनके चिंतन की स्त्री उन अपराधियों के साथ किस तरह खड़ी रहती?

आश्चर्य की बात यह है कि जो स्त्री शरद जोशी को दिखाई दी वह किसी स्वदेशी विचारक, समाजवादी या वामपंथी को क्यों नहीं दिखाई दी? बीजिंग महिला परिषद के द्वारा तय दायरे में हमारी सरकारें कानून बना बना कर पुरुष विरोधी अदालतों को मजबूत करती रही और उनके बोझ से हमारी सदियों पुरानी पारिवारिक संस्था ध्वस्त होती चली गयी. आज बड़े बुजुर्गों, साझा रिश्तेदारों-मित्रों को मानो हमारे घरों से बाहर निकाला जा चुका है और वकील, पुलिस और अदालतें न्याय के नाम पर इन परिवारों के उत्पादन में अपना हिस्सा मांग रहे हैं. जो पैसा बच्चों के शिक्षण और चारित्रिक विकास पर खर्च हो सकता था, वह पैसा नये नये कानूनों के द्वारा समाज को और ज्यादा गुलाम बनाने पर खर्च हो रहा है.     

एक निरपेक्ष दृष्टा के नाते मेरा सदा यह मानना रहा है कि जब तक पुरुष के माध्यम से महिलायें और महिलाओं के गर्भ से पुरुष जन्म लेते रहेगा, वे एक दूजे के दुश्मन कैसे हो सकते है? किंतु दुर्भाग्य की बात यही है कि आज हमने एक ही ईश्वर के बनाये एक दूसरे के लिए पूरक दो सृजनात्मक अविष्कारों को प्रतिद्वंदी के रूप में एक दूसरे के सामने खड़ा कर दिया है. इस अर्थ में मनुष्यता मानो पहली बार अपने अस्तित्व का सबसे बड़ा सकंट झेल रही है. काश: अपनी तरुणाई का बड़ा हिस्सा पाश्चात्य विश्व में जीने वाले शरद जोशी को जो सृजनात्मक महिला भारत में दिखाई दी, वही हमारे तमाम समाजवादी, स्त्रीवादी और वामपंथी कार्यकर्ताओं को दिखाई दे जाती तो शायद आज हम ज्यादा गरिमामय और स्वाधीन जिंदगी के पथ पर अग्रगामी होते. न्याय की भीख माँगते पुलिसथानो और अदालतों के भ्रष्ट गलियारों में नहीं भटकते.

अपने ऐसे ही लाजवाब विचारों से मेरी पीढ़ी को समृद्ध करनेवाले इस ज्ञान योगी के सामने अपने अंतर्मन की गहराइयों से झुकने को जी चाहता है. ज्ञान-योगी कर्म की यह यात्रा शतायु हो, यही उस महान ईश्वर से प्रार्थना है..

दिनेश शर्मा
  

गाँधी नाम की दुकान

इस देश में गाँधी नाम के प्रमाणपत्र बाँटने का ठेका केवल गिने चुने खानदानों या उनके लाभार्थियों ने लेकर रखा है. इन लोगों को लेफ्ट से कोई समस्य...