Tuesday, September 1, 2015

महिला प्रश्न और शरद जोशी



महिला प्रश्न और शरद जोशी

शेतकरी संघठन के प्रणेता शरद जोशी दिनांक ३ सितंबर को अपनी जिंदगी के आठ दशक पूरे कर रहे हैं. आपातकाल के संक्रमणकाल के बाद जब देश में क्रांति और बदलाव के नाम पर कई अजूबे जन्म ले रहे थे, महाराष्ट्र की प्रतिभा संपन्न भूमी ने अपने स्तर पर किसानों के जीवन की चिरस्थायी त्रासदी का हल खोजने की कोशिश की थी. डेढ़ शताब्दी पहले यही प्रयास ज्योतिबा फुले भी कर चुके थे. उलट पुलट का यह वह दौर था, जब वामपंथ की असफलता क्षितिज पर दिखाई देने लगी थी, समाजवादी राजनीती अपने-अपने जन्म स्थानों पर मजबूत जातियों का आश्रय खोज रही थी और हिन्दूवादी राजनीती का जन्म होना बाकी था. उस नितांत प्रेरणाहीन दौर में शरद जोशी उठे और उनके साथ उठा था सीधेसाधे मराठी मानूस के भीतर का वैश्विक कालपुरुष.

शरद जोशी ने नारेबाजी नहीं की, वे दूसरों के विचारों की फंतासी में नहीं भटके. उन्होंने पूना के अम्बेठान में स्वयं खेती की, खेती में मजदूरी करने वाले मजदूरों और उनकी महिलाओं के साथ खेती के प्रत्यक्ष अनुभव साझा किये और अपने उन्ही अनुभवों की शिदोरी साथ में लेकर जब वे अपनी उपज को बाजार में बेचने आये, एक क्रूर सत्य से उनका साक्षात्कार हुआ. सत्य यही था कि नेहरूवादी विकास माडेल में किसानों का शोषण कोई हादसा नहीं, एक सोची समझी सरकारी योजना का हिस्सा है. इस अनुभव से यह सत्य भी उद्घाटित हुआ कि सरकारें महज एक अनिवार्य बुराई मात्र है, वे समाज को ना तो बदल सकती है ना ही सुधार सकती है. अत: वे जितना कम या सीमित हो उतना मानवीय प्रतिभा अपने अंतहीन सपनों की यात्रा पर निकल सकती है.  जहाँ जहाँ सरकारे मजबूत होगी, वहाँ वहाँ का समाज उतना दरिद्र होगा. शरद जोशी ने यह सत्य उस समय उद्घाटित किया था जब सोव्हियत रूस का पतन होना बाकी था और चीन के भीतर की भयानक खबरें अभी बाहर आयी नहीं थी.

इन्हीं प्रत्यक्ष अनुभवों ने शरद जोशी के स्त्री संबंधी विचारों को भी घड़ा था. जब बीजिंग में वैश्विक महिला सम्मेलन हो रहा था और पूर्व से पश्चिम तक समूचे विश्व में नारी मुक्ति के उग्र नारों का शोर सुनाई दे रहा था, शरद जोशी ने महाराष्ट्र में बीजिंग विरोधी महिला परिषद का आयोजन किया. उन्होंने पहली बार किसानों और उद्यमियों की महिलायें क्या सोचती है, इस सत्य को दुनिया के सामने रखा. शरद जोशी के चिंतन की महिलायें पुरुषों से मुक्त नहीं होना चाहती थी, वे उत्पादन की प्रक्रिया में अपनी मेहनत का सम्मान चाहती थी. उसका सपना आजादी का नहीं, बल्कि पुरुष के जीवन में गरिमापूर्ण उपस्थिति का था. उनके चिंतन की महिला के लिए उसकी प्रेरणा के बिना उसका पुरुष और अपने पुरुष के उद्यम के बिना वह स्वयं अधूरी थी. वे दोनों एक दूसरे को पूर्ण करनेवाली ताकतें थी, और इसलिए उन्हें एक दूसरे के साथ में रहने का तरीका समझना ही पड़ेगा और साथ साथ एक दूसरे की उन्नति का साधन बनना होगा.  

शरद जोशी के चिंतन की नारी अपनी कथित आजादी के नाम पर मनुष्यता ने अपनी सृजनात्मकता से जो कुछ भी आज तक अर्जित किया है उसे दांव पर लगाना नहीं चाहती बल्कि अपने परिवार में ही रहकर एक नैतिक जीवन जीते हुए भावी पीढ़ी का निर्माण करना चाहती है. उसके लिए पति और ससुरालवालें असली दुश्मन नहीं थे बल्कि शराब के अड्डे चलानेवाले, लॉटरी और मटके की दुकान चलानेवाले और महिलाओं का अश्लील निरूपण करके मनुष्य की प्रतिभा को तबाह करने वाले लोग  असली दुश्मन थे. इसलिए शरद जोशी के चिंतन की महिला अपने पतियों के खिलाफ उग्र नारे लगाती बाहर नहीं निकली बल्कि उसने शराब के अड्डों पर धरने दिए और सरकार को उन्हें बंद करने के लिए मजबूर किया. उनके चिंतन की महिला पुराणों की सावित्री की तरह अपने पति को यमराज के भी चंगुल से निकालने का इरादा रखती थी, उसे त्यागकर अपने लिए कोई नया स्वर्ग निर्मित नहीं करना चाहती थी.

वह जानती है कि “भारत के उपर इंडिया के हमले” में उसका पति भी घायल है, टूटा हुआ, परास्त और हतबल है. वह देख रही थी कि शहर की भाषा, शहर के कानून और शहर के सरकारी कारकून किस तरह उसके पति के श्रम की कौड़ी मोल बोलियाँ लगाते है और किसतरह उसे बेवकूफ साबित करने पर तुले है. इसीलिए गाँव की वह महिला इंडिया के बनाये कानूनों से उतनी ही दुखी और शोषित है, जितनी कि उसके परिवार के अन्य लोग. उसके लिए सरकार, पुलिस और अदालतें शोषण से मुक्ति देनेवाले तारणहार ना होकर पति के साथ उसके भी साझा दुश्मन है क्योंकि ये तबके उन दोनों की मेहनत से उपजे उत्पादन पर डाका डालने वाले सरकारी मान्यताप्राप्त दस्यु गिरोह मात्र हैं.  समस्त कानूनों के प्रति शरद जोशी की सोच का अंतर्भूत तिरस्कार उन्हें हिंद स्वराज्य से झलकते गाँधी के करीब-करीब लेकर जाता है. कभी डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने काँग्रेस से यही प्रश्न किया था, “कैसी सरकार और कौनसी आजादी? यदि आपकी कथित आजादी के बाद उच्च वर्ग शोषक और दलित वर्ग शोषित ही रहनेवाला हो, तो हम क्यों तुम्हारे स्वतंत्रता समर में शामिल हो? हम तो तुम्हारी आजादी के बाद लुटने ही वाले है, तुमसे बेहतर तो ये अंग्रेज है, जो कम से कम हमें सुरक्षा तो दे रहे है.”   

ठीक यही प्रश्न शरद जोशी ने नेहरू और इंदिरा गाँधी प्रणित काँग्रेस से किया और अपने लाजबाव आँकड़ों से यह साबित कर दिया कि नेहरु की शहर समर्थक और उद्योगों को पोषित करनेवाली राजनीति में ही उजड़ते और जर्जर होते ग्रामीण भारत का अपराधी छिपा था. फिर उनके चिंतन की स्त्री उन अपराधियों के साथ किस तरह खड़ी रहती?

आश्चर्य की बात यह है कि जो स्त्री शरद जोशी को दिखाई दी वह किसी स्वदेशी विचारक, समाजवादी या वामपंथी को क्यों नहीं दिखाई दी? बीजिंग महिला परिषद के द्वारा तय दायरे में हमारी सरकारें कानून बना बना कर पुरुष विरोधी अदालतों को मजबूत करती रही और उनके बोझ से हमारी सदियों पुरानी पारिवारिक संस्था ध्वस्त होती चली गयी. आज बड़े बुजुर्गों, साझा रिश्तेदारों-मित्रों को मानो हमारे घरों से बाहर निकाला जा चुका है और वकील, पुलिस और अदालतें न्याय के नाम पर इन परिवारों के उत्पादन में अपना हिस्सा मांग रहे हैं. जो पैसा बच्चों के शिक्षण और चारित्रिक विकास पर खर्च हो सकता था, वह पैसा नये नये कानूनों के द्वारा समाज को और ज्यादा गुलाम बनाने पर खर्च हो रहा है.     

एक निरपेक्ष दृष्टा के नाते मेरा सदा यह मानना रहा है कि जब तक पुरुष के माध्यम से महिलायें और महिलाओं के गर्भ से पुरुष जन्म लेते रहेगा, वे एक दूजे के दुश्मन कैसे हो सकते है? किंतु दुर्भाग्य की बात यही है कि आज हमने एक ही ईश्वर के बनाये एक दूसरे के लिए पूरक दो सृजनात्मक अविष्कारों को प्रतिद्वंदी के रूप में एक दूसरे के सामने खड़ा कर दिया है. इस अर्थ में मनुष्यता मानो पहली बार अपने अस्तित्व का सबसे बड़ा सकंट झेल रही है. काश: अपनी तरुणाई का बड़ा हिस्सा पाश्चात्य विश्व में जीने वाले शरद जोशी को जो सृजनात्मक महिला भारत में दिखाई दी, वही हमारे तमाम समाजवादी, स्त्रीवादी और वामपंथी कार्यकर्ताओं को दिखाई दे जाती तो शायद आज हम ज्यादा गरिमामय और स्वाधीन जिंदगी के पथ पर अग्रगामी होते. न्याय की भीख माँगते पुलिसथानो और अदालतों के भ्रष्ट गलियारों में नहीं भटकते.

अपने ऐसे ही लाजवाब विचारों से मेरी पीढ़ी को समृद्ध करनेवाले इस ज्ञान योगी के सामने अपने अंतर्मन की गहराइयों से झुकने को जी चाहता है. ज्ञान-योगी कर्म की यह यात्रा शतायु हो, यही उस महान ईश्वर से प्रार्थना है..

दिनेश शर्मा
  

Thursday, July 30, 2015

याकूब मेमन और टीवी बहस का नया पतन






याकूब मेमन और टीवी बहस का नया पतन

मान लो कि आप और मैं टीवी स्टूडियो की किसी बहस का हिस्सा है. अचानक बहस हिंसक हो जाती है. आप सारे देश के दर्शकों के सामने मुझे एक तमाचा जड़ देते है.. सारा देश देख रहा है, वहाँ बैठे कर्मचारी बीच बचाव कर मुझे आपसे दूर कर देते है.. अब मेरे सामने न्याय पाने के केवल चार रास्ते बचते है,  पहला तो यह कि यदि मैं आपसे बलशाली हूँ तो मैं वहीं आपको जवाबी तमाचा मारूँ और अपना हिसाब चुकता कर लूँ. दूसरा यह कि यदि मैं आपसे कमजोर हूँ तो  आपसे शक्तिशाली किसी बलशाली की तलाश करूं और आपको सुधारने का जिम्मा उसे सौंप दूँ. तीसरा पुलिस में शिकायत देकर आपको कानून के दायरे में ले आऊं और देश के कानून के अनुरूप पुलिस को आपके विरुद्ध सबूत जुटाने में सहायता देकर आपको सजा दिलवाने का प्रयास करूँ. अंतिम, यदि पुलिस भी मेरी बात को सुनने को तैयार नहीं है तो मैं सीधा न्यायालय में मुकदमा दायर करूँ और आपको कानून के सामने पेश होने को मजबूर करके न्याय की गुजारिश करूँ.

पहले दो मामले में मैं भले ही व्यक्तिगत रूप से मजबूत साबित हो जाऊं, एक न्यायिक व्यवस्था के रूप में देश कमजोर साबित होगा. क्योंकि सजा देने का काम देश का है, मेरा या किसी व्यक्ति का नहीं. बाद के दोनों मामलों में दो संभावना है. या तो आप का अपराध साबित नहीं होगा और आपको बाइज्जत बरी कर दिया जायेगा. इसमें भले मेरी व्यक्तिगत हार हो जाये, किंतु देश की जीत हुयी, ऐसा माना जायेगा. किंतु मान लो कि मैं आपका अपराध साबित करने में सफल हो जाता हूँ और आपको सजा देने का वक्त आ जाता है. क्या उस हालात में आप सजा से बचने के लिए यह तर्क दे सकते हैं कि पहले इस शहर के इतिहास के तमाम तमाचों की भी जाँच हो और उनके अभियुक्तों को भी न्यायालय के सामने लाया जाये, उन्हें भी सजा दी जाये, उनके साथ या उनके बाद में मेरी सजा का विचार करना. तब तक के लिए मुझे मेरी अन्य मनमानियों के लिए खुला छोड़ दिया जाये?    

चलो, तमाचे जैसे मामूली अपराध की बात जाने दीजिए. क्या हत्या, बलात्कार, डकैती, तेजाब फेंक कर बदरूप कर देने जैसे मामलों के अभियुक्त सजा से बचने के लिए यही तर्क दे सकते हैं? क्या किसी चोरी की सजा के अभियुक्त का वकील न्यायालय के सामने यह तर्क दे सकता है कि पहले इस शहर में आज तक हुयी तमाम चोरीयों के अभियुक्तों को भी न्यायालय के सामने लाया जाये, उनकी सजा का फैसला होने के बाद ही मुझे भी सजा दी जाये, अन्यथा मुझे अभी छोड़ दिया जाये. क्या किसी मासूम के बलात्कार और नृशंस हत्या का दोषी अपने बचाव में यह कह सकता है कि पहले मेरे पूर्व और बाद के समस्त बलात्कारियों को सजा दी जाये और बाद में ही मेरी सजा पर फैसला हो. क्या कोई भ्रष्टाचारी नेता, सजा की घोषणा होने पर इसी आधार पर सजा से बचने का तर्क देता है कि पहले दूसरों के भ्रष्टाचार की जाँच हो और उन्हें सजा दी जाये, बाद में मेरी सजा की घोषणा हो. तब तक के लिए मुझे मेरी मनमानियों के लिए खुला रखा जाये.   

क्या यह तर्क कोई सभ्य व्यवस्था स्वीकार करेगी? और मान लो कि यह कुतर्क स्वीकार कर लिया जाता है, तो क्या कोई व्यवस्था कही जाने वाली चीज देश में बचेगी और भीड़ का बदले का निजाम हमारी आपकी सभी की जिंदगी को लील नहीं लेगा? क्या उस व्यवस्था में लोग अपने मामले सड़कों पर निपटाने के लिए प्रवृत नहीं होंगे? क्या यह व्यवस्था कमजोरों को सदा के लिए न्याय से वंचित नहीं कर देगी?

देश के तमाम समाचार चैनल्स पर याकूब मेमन के मामले में पिछले दो दिनों में जारी बहस का कुल निचोड़ यही है. पहले दूसरों के मामले निपटाइए और बाद में मेरी ओर झांकिये. यदि आप दूसरों को सजा नहीं दे सकते तो मुझे भी सजा देने का आपको कोई हक नहीं है. इस बहस से पत्रकारों और राजनैतिक प्रवक्ताओं की अक्ल का केवल दिवालियापन ही साबित होता है.  जो देश पिछले तीन दशकों से आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित देशों में शुमार किया जाता हो, जहाँ की संसद पर बारूदी हमला हो चुका हो, आर्थिक नाभी पर चोट की जा चुकी हो, उस देश के टीवी स्टूडियोज् में पिछले दो दिनों में बहस का स्तर मानो निम्न से निम्नतर होने की होड़ कर रहा था.  उन तमाम लोगों के लिए, जो ऐसे तर्क देते है और उनके लिए, जो ऐसे तर्क देने वालों  के लिए माइक, मंच और माहौल का इंतजाम करते है, आतंकवाद और अपराध कोई समस्या नहीं है, व्यवस्था पर अविश्वास कोई मुद्दा ही नहीं है.

सजा में होनेवाली दशकों की देरी, हमारी न्यायिक व्यवस्था की सुस्त रफ़्तार अक्सर लोगों को भीड़तंत्र की ओर आकर्षित करती है. अभी गुरदासपुर हमले के दौरान ट्विटर पर जो संदेश आ रहे थे, उनका संकेत यही था कि हमलावरों को वहीं निपटा दिया जाये, न्यायिक प्रक्रिया का झंझट पालने की आवश्यकता ही नहीं है.  

एक ओर जहाँ टीवी की बहस किसी भी सजा को असंभव बना देगी, वहीं दूसरी ओर ट्विटर की बहस किसी भी न्यायिक प्रकिया को. दोनों स्थितियां हमें केवल अराजकता की ओर ले जाती है. दुर्भाग्य यही है कि एक अराजकता समाज के तथाकथित बुद्धिमानों द्वारा निर्मित होगी तो दूसरी राह चलते नासमझ नागरिकों द्वारा. अल्पसंख्यकों के बचाव में जो तर्क टीवी की बहस में दिए गए, उनसे केवल अल्पसंख्यक ही खतरे में पड़ेंगे, बहुसंख्यक नहीं. क्योंकि अराजकता की स्थिति कहीं भी हो, उसके सबसे बड़े शिकार तो अल्पसंख्यक ही होते है. न्यायिक प्रक्रिया तो होती ही कमजोर की रक्षा के लिए है.

हमारे पड़ौसी देश, इन मामलों से कैसे जूझ रहे हैं, चलो यह भी देख लेते है. पाकिस्तान ने पेशावर की स्कूल पर हमले के बाद महज पिछले छह महीनो में  कुल १८० से ज्यादा लोगों को फांसी के फंदे के हवाले किया है. उसने एक-एक दिन में बीस-बीस लोगों को क़ानूनी तरीके से उनके घृणित अपराधों के बदले में अंतिम मुकाम दिखाया है. बांग्लादेश ने २००८ के बाद ही कुल २५ लोगों को इसी अंदाज में उनके अपराधों की सजा दी है. श्री लंका में भले किसी को फांसी नहीं दी गयी हो किंतु उन्होंने अपने विरोधियों को बिना किसी सुनवाई के युद्ध के मैदान में ही निपटा दिया है. आज भी उसके भूतपूर्व राष्ट्रपति सारी दुनिया में युद्ध अपराधी के रूप में ही याद किये जाते है. बर्मा ने तो अपने  यहाँ सदियों से रह रहे अल्पसंख्यकों की नागरिकता को ही नकार दिया है और उन्हें असुरक्षित जहाजों में बिठाकर भूख और प्यास से मरने के लिए समंदर की विकराल लहरों के हवाले कर दिया है. चीन और अन्य साम्यवादी राष्ट्रों की तो बात ही जाने दीजिए. वहाँ तो अपने विरोधियों को बिना किसी सुनवाई के गायब कर देने या भूखे कुत्तों के सामने फेंक कर काम तमाम करने की ताजा-ताजा मिसालें मौजूद है.

क्या इसके मुकाबिले हम रात को तीन बजे सुनवाई करने वाले हमारे सर्वोच्च न्यायालय पर गर्व नहीं कर सकते? फांसी की सजा हो या ना हो, यह बहस का विषय हो सकता है. किंतु क्या यह बहस अभी एक ऐसे व्यक्ति के लिए जरुरी थी, जिस पर किसी दुश्मन देश के साथ मिलकर देश पर हमला करने का आरोप साबित हो चुका हो? क्या किसी गलत पात्र के प्रति गलत समय पर सहानुभूति का दुराग्रह, समाज की समग्र संवेदनशीलता को सदा के लिए कुंठित करने का काम नहीं करेगा? 

यदि ऐसा होता है, तो इसके असली शिकार कौन रहेंगें? अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक? 

दिनेश शर्मा








Monday, July 27, 2015

दक्षिण के राम- अब्दुल कलाम



दक्षिण के राम- अब्दुल कलाम

महान भारत की महान ज्ञान परंपरा के वर्तमान दौर के सबसे प्रखर नक्षत्र अब्दुल पाकिर जैनुलाब्दीन कलाम की जीवन यात्रा कल रात २७ जुलाई २०१५ को परदे के आड़ चली गयी. बिना किसी बुलावे के कुछ आँसू आँखों पर आकर ठहर गए और यूँ लगा जैसे दिल के मंदिर में बैठा एक गरिमामय अतीथि बिना किसी को बताये सुबह सबेरे अपनी आगामी यात्रा पर चला गया. आजादी के बाद जन्मे हर भारतीय के लिए कलाम का नाम सबसे गर्व से किया गया उच्चारण था. जाति, भाषा, धर्म  और तमाम छोटी बड़ी अस्मिताओं से बटें हम भारतीयों के हृदय सिंहासन पर इस एक व्यक्ति का शासन मानो सबसे सुरक्षित, सबसे अटल था.

राममनोहर लोहिया ने लिखा है कि त्रेता युग में उत्तर की अयोध्या का एक कुलदीपक राजकुमार राम अपनी दक्षिण विजय यात्रा पर निकला और उसकी इसी विजय यात्रा ने उत्तर और दक्षिण भारत को सदा के लिए एक कर दिया था और एक महान भारतीय सांस्कृतिक विश्व की शुरुआत की थी. इस एकता ने कुल-हीन, शील-हीन तमाम छोटे बड़े कबीलाई समूहों को एक महान सपना दिया और उनकी बिखरी-बिखरी अपने आप से ही संघर्षरत उर्जा एक समर्थ और समृद्ध भारत के निर्माण में काम आयी.  नतीजे में सभी को समाहित करने वाली एक महान सांस्कृतिक एकता का जन्म हुआ. अमेरिका में “स्टेचू ऑफ लिबर्टी” खड़ी होने के सदियों पहले इस देश ने अपनी इसी धरोहर के बल पर मानवीय मष्तिष्क में जन्मे हर विचार को अपने यहाँ स्थान दे दिया था. इसी के प्रशांत आश्वासन के चलते सारी दुनिया से ठुकराए गए बंदे भारत माता की गोद में आये और सदा के लिए यहाँ के होकर रह गए.

हमारी सदी में दक्षिण के रामेश्वरम में एक गरीब और सुसंस्कृत परिवार में जन्मे कलाम ने अपनी अखंड देशभक्ति, ऋषियों के समान सादगी, भारत की हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरा के पालन और देश की युवा शक्ति में अपने अटल विश्वास के चलते हर भारतीय के मन में ऐसे ही एक राष्ट्रीय स्वप्न को जन्म दे दिया है. वे एक महान वैज्ञानिक थे, किंतु उनके भीतर का कण कण सैकड़ों सदियों के विस्तार में फैली भारत की अनादि अनंत ज्ञान परंपरा से उपजा था, पश्चिम से नहीं. वे स्वयं अपने आपको “संपूर्ण रूप से मेड इन इंडिया’ बताने में गर्व महसूस करते थे.  वे हरेक अर्थ में हमारी हजारों वर्षों की ऋषि परंपरा की एक आधुनिक कड़ी थे. भारत को सपेरों और धूल सने साधुओं का पिछड़ा हुआ देश मानने वाले पश्चिम को वे हम भारतीयों द्वारा दिया गया एक बेमिसाल उत्तर थे. इस अर्थ में वे विवेकानंद और रविन्द्रनाथ की कड़ी के ऐसे भारतीय थे, जिसने पश्चिम को यह पूर्वी आईना उनकी भाषा में इतने सामर्थ्य के साथ दिखाया था.

वे एक ऐसे महान मुस्लिम थे जिसको इस देश का हर हिंदु, सिख, जैन ईसाई और बौद्ध प्यार करता था. प्यार ही नहीं करता था बल्कि अपने बच्चों को उनकी प्रेरणादायक किताबें पढ़ने को देता था और जीवन में उनके जैसा बनने की प्रेरणा देता था. और यह मुकाम उन्होंने धर्मनिरपेक्षता पर लंबे चौड़े भाषण देकर हासिल नहीं किया था बल्कि  वास्तविक अर्थो में इसी भारतीय भूमी में जन्मे या पनपे समस्त धर्मो के मूल सार को अपने रोजाना के जीवन में उतार कर हासिल किया था. उनका अपना जीवन इस बात की मिसाल है कि राष्ट्र की एकता समाज को बाँटने वाले कानूनों और कथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुछ परिवारों के अयोग्य वारिसों को सदा सर्वदा के लिए अपने सर पर बिठाने से नहीं आयेगी बल्कि हर समूह और अस्मिता द्वारा राष्ट्र निर्माण के इस अनवरत यज्ञ में अपनी सर्वोत्तम आहूति देने के बाद अपने आप आ जायेगी. दण्डकारण्य के उत्पाती वानर यदि रामराज्य में पूज्यनीय देवता बन सकते थे तो छोटी बड़ी अस्मिताओं के नाम पर भटके हुए हमारे आज के युवा क्यों नहीं एक विशाल भारतीय सपने का सम्मानित हिस्सा बन सकते है?

वे एक ऐसे राष्ट्रपति थे, जिनका सम्मान इस पद पर बैठने के पूर्व ही इस पद से अधिक हो चुका था.  जिस दिन वे भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ ले रहे थे, हर भारतीय मानो खुद के अच्छे चयन को लेकर खुद को ही बधाई दे रहा था. इस पद पर रहते हुए उन्होंने पूरे भारत के कोने कोने में जाकर देश की युवा पीढ़ी को राष्ट्र के भविष्य के लिए सपने देखने का आव्हान किया और महान जीवन जीने के नुस्खे सिखाए. और ये नुस्खे भी ऐसे थे मानो गीता का कृष्ण आज के  अर्जुन को पुकार रहा हो, जैसे कि धम्म पद से बुद्ध इस देश की करुणामय प्रतिभा को आवाज दे रहे हो. जैसे कि कोई सूफी संत अपने सूफी जीवन नृत्य में हम सभी को शामिल होने का आमंत्रण भेज रहा हो. वे हमारी पीढ़ी के ऐसे भारतीय थे जिनका होना ही एक संदेश था. पश्चिम की ओर मुखातिब इस दौर में जिनका होना ही अपनी जड़ों का अहसास दिलाने के लिए पर्याप्त था. 

आज उनके जाने से मेरे भीतर का भारतीय मन उदास है.. आँखों में आँसू है.. किंतु कहीं गहरे में एक शपथ भी अंगड़ाई ले रही है..

श्रीमान कलाम! हम आपको मरने नहीं देंगे.. आपकी स्मृतियों का सम्मान करते हुए हम सभी अपनी अपनी क्षुद्र अस्मिताओं से उपर उठेंगे और इस देश को इसका खोया हुआ गौरव वापस दिलाने के लिए अपनी प्रतिभा, कला, धर्म और संस्कृति का सर्वोत्तम प्रदान करेंगे.. 

एक महान भारतीय राष्ट्र के जन गण मन बन कर हम आपका अधूरा स्वप्न पूरा करेंगे...

जय हिंद.. जय भारत...

दिनेश शर्मा

गाँधी नाम की दुकान

इस देश में गाँधी नाम के प्रमाणपत्र बाँटने का ठेका केवल गिने चुने खानदानों या उनके लाभार्थियों ने लेकर रखा है. इन लोगों को लेफ्ट से कोई समस्य...